Shyama Prasad Mukherjee : भारतीय राजनीति के ध्रुवतारा और भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की आज 6 जुलाई को 125वीं जयंती है। उनका जन्म 6 जुलाई 1901 को एक अत्यंत विद्वान और प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था। उनके पिता सर आशुतोष मुखर्जी न केवल एक प्रख्यात न्यायाधीश थे, बल्कि शिक्षा जगत के दिग्गज और कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति भी थे। डॉ. मुखर्जी की प्रतिभा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मात्र 33 वर्ष की युवा आयु में ही उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति पद का दायित्व संभाला। चार वर्षों तक इस पद पर रहते हुए उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में जो अमिट छाप छोड़ी, वह आज भी प्रेरणा का स्रोत है।
राजनीति में प्रवेश और वैचारिक स्पष्टता का सफर
शिक्षा जगत में अपनी धाक जमाने के बाद, डॉ. मुखर्जी ने राजनीति के क्षेत्र में कदम रखा। उन्होंने अपने सफर की शुरुआत कांग्रेस के टिकट पर विधायक बनकर की थी, लेकिन वैचारिक मतभेदों के चलते उन्होंने बाद में हिंदू महासभा का दामन थाम लिया। जब कांग्रेस ने विधायिका के बहिष्कार का निर्णय लिया, तो उन्होंने अपने पद से इस्तीफा देकर निर्दलीय चुनाव लड़ने का साहस दिखाया और विजयी हुए। उनकी नेतृत्व क्षमता को देखते हुए ही देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें अपने मंत्रिमंडल में उद्योग और आपूर्ति मंत्री के रूप में शामिल किया था। हालांकि, ‘लियाकत-नेहरू समझौते’ पर असहमति के कारण उन्होंने 6 अप्रैल 1950 को मंत्री पद से इस्तीफा देकर अपनी स्वतंत्र वैचारिक राह चुनी।
भारतीय जनसंघ की स्थापना: एक नए युग का उदय
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के तत्कालीन प्रमुख एमएस गोलवलकर से परामर्श के बाद, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 21 अक्टूबर 1951 को ‘भारतीय जनसंघ’ की नींव रखी। वे इसके प्रथम अध्यक्ष बने। उन्होंने कश्मीर के विशेष दर्जे को भारत की एकता के लिए खतरा माना और ‘एक देश, एक विधान, एक प्रधान, एक निशान’ का नारा बुलंद किया। उन्होंने अपने पूरे जीवन में जम्मू-कश्मीर के भारत में पूर्ण विलय के लिए संघर्ष किया और अनुच्छेद 370 के प्रबल विरोधी के रूप में अपनी पहचान बनाई।
कश्मीर संघर्ष और संदिग्ध परिस्थितियों में बलिदान
वर्ष 1953 में जम्मू-कश्मीर के मुद्दे पर उन्होंने अपना ऐतिहासिक आंदोलन तेज किया और बिना परमिट के कश्मीर में प्रवेश करने की कोशिश की, जिसके कारण उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। 23 जून 1953 को मात्र 51 वर्ष की आयु में श्रीनगर की जेल में संदिग्ध परिस्थितियों में उनका निधन हो गया। उनके बलिदान ने देश को झकझोर दिया और वे देश की एकता के अमर प्रहरी बन गए।
125वीं जयंती: गृह मंत्री अमित शाह बंगाल में करेंगे श्रद्धांजलि
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जयंती को भारतीय जनता पार्टी ने एक बड़े वैचारिक और राजनीतिक आयोजन के रूप में मनाने का निर्णय लिया है। इस विशेष अवसर पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह आज पश्चिम बंगाल का दौरा कर रहे हैं। वे डॉ. मुखर्जी के पैतृक गांव जाकर उन्हें नमन करेंगे और जयंती से जुड़े विभिन्न कार्यक्रमों में भाग लेकर उनके राष्ट्रवाद के विचारों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे। डॉ. मुखर्जी के सिद्धांत आज भी देश की एकता और अखंडता के लिए मार्गदर्शक बने हुए हैं।










