Priyanka Chaturvedi: शिवसेना (उद्धव बाला साहेब ठाकरे गुट) की एक अहम बैठक में पार्टी के अंदर चल रहे मतभेद खुलकर सामने आ गए। यह बैठक राज्सभा चुनाव के कुछ दिनों बाद आयोजित की गई थी, जिसका उद्देश्य पार्टी में एकजुटता बनाए रखना था। हालांकि, बैठक के दौरान कई मुद्दों पर नेताओं के बीच असहमति देखने को मिली, जिससे अंदरूनी खींचतान की चर्चा तेज हो गई।
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उद्धव ठाकरे का भरोसे का संदेश
आपको बता दें कि, बैठक की शुरुआत करते हुए उद्धव ठाकरे ने अपने सांसदों को संबोधित किया और उन पर पूरा लेकिन उन्हें अपने सभी साथियों की निष्ठा पर विश्वास है। ठाकरे ने यह भी स्पष्ट किया कि वह पूरी राजनीतिक लड़ाई अपने सांसदों के सहयोग से ही लड़ रहे हैं। उनका यह बयान पार्टी में एकजुटता का माहौल बनाने की कोशिश के रूप में देखा गया।
राज्यसभा सीट को लेकर कांग्रेस का दबाव
बैठक के दौरान राज्यसभा चुनाव 2026 को लेकर भी चर्चा हुई। सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस नेताओं की ओर से इस सीट को लेकर दबाव बनाया गया। कांग्रेस चाहती थी कि यह सीट उसे दी जाए। इस पर उद्धव ठाकरे ने स्पष्ट रूप से कहा कि इस विषय पर कांग्रेस को राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी से बात करनी चाहिए। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि उनकी पार्टी पर इस तरह का दबाव बनाना उचित नहीं है और इस तरह की राजनीति से कोई फायदा नहीं होगा।
प्रियंका चतुर्वेदी की नाराज़गी

बैठक के दौरान माहौल तब गर्म हो गया जब सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने अपनी नाराज़गी जाहिर की। उन्होंने खुलकर विरोध दर्ज करते हुए सवाल उठाया कि संजय राउत ने शरद पवार का नाम लेकर बयान क्यों दिया। उनका कहना था कि इस तरह के बयान पार्टी की रणनीति के अनुरूप नहीं हैं। इस पर उद्धव ठाकरे ने तुरंत हस्तक्षेप किया और संजय राउत का बचाव करते हुए कहा कि अंतिम निर्णय पार्टी नेतृत्व ही लेगा।
बैठक के बाद भी जारी रहा असंतोष
बैठक खत्म होने के बाद भी असंतोष पूरी तरह शांत नहीं हुआ। कुछ सांसदों ने निजी तौर पर सवाल उठाए। एक सांसद ने टिप्पणी की कि प्रियंका चतुर्वेदी को लंबे समय तक अवसर मिलने के बावजूद अपेक्षित परिणाम नहीं दिखे। वहीं, मराठवाड़ा क्षेत्र के एक सांसद ने आदित्य ठाकरे की सक्रियता पर भी सवाल खड़े किए और कहा कि उन्हें पूरे महाराष्ट्र में अधिक दौरे करने चाहिए।
आदित्य ठाकरे की चुप्पी बनी चर्चा का विषय
सूत्रों के अनुसार, बैठक के दौरान आदित्य ठाकरे ज्यादा सक्रिय नहीं दिखे और उन्होंने बहुत कम बातचीत की। उनकी यह चुप्पी भी चर्चा का विषय बन गई और इसे पार्टी के भीतर चल रहे तनाव से जोड़कर देखा गया। कुछ लोगों का मानना है कि उनकी निष्क्रियता ने स्थिति को और जटिल बना दिया।
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