I-PAC Case : सुप्रीम कोर्ट ने ममता सरकार से पूछा- क्या CM के बाधा डालने पर ED सिर्फ ‘तमाशा’ देखे?

I-PAC Case Update: क्या मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने आई-पैक दफ्तर में घुसकर ईडी की छापेमारी रोकी? सुप्रीम कोर्ट ने बंगाल सरकार की उस दलील को खारिज कर दिया जिसमें ईडी को 'व्यक्ति' न होने के नाते याचिका का हक न होने की बात कही गई थी। जानें कोर्ट की उस टिप्पणी के मायने!

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

मार्च 24, 2026

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I-PAC Case : पश्चिम बंगाल में प्रवर्तन निदेशालय (ED) और राज्य सरकार के बीच जारी टकराव अब देश की सर्वोच्च अदालत की दहलीज पर है। मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने ममता बनर्जी सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए एक मौलिक प्रश्न खड़ा किया। जस्टिस पीके मिश्रा और जस्टिस एनवी अंजारी की पीठ ने ममता सरकार द्वारा ईडी की याचिका पर जताई गई आपत्तियों को खारिज करते हुए पूछा, “क्या ईडी के अधिकारी मात्र इसलिए भारत के नागरिक नहीं रह जाते क्योंकि वे एक केंद्रीय एजेंसी का हिस्सा हैं?” अदालत ने स्पष्ट किया कि जांच में बाधा डालना और अधिकारियों के अधिकारों का हनन करना संवैधानिक ढांचे के खिलाफ है।

संवैधानिक नैतिकता पर सवाल: ‘अगर केंद्र में आपकी सरकार होती तो?’

सुनवाई के दौरान पीठ ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण काल्पनिक स्थिति पेश कर ममता सरकार को आईना दिखाया। सुप्रीम कोर्ट ने पूछा, “अगर केंद्र में आपकी पार्टी सत्ता में होती और कोई दूसरी राजनीतिक पार्टी राज्य स्तर पर केंद्रीय जांच में ऐसा ही हस्तक्षेप करती, तो क्या वह आपको स्वीकार्य होता?” यह टिप्पणी उस समय आई जब अदालत राजनीतिक परामर्श फर्म आई-पैक (I-PAC) के कार्यालयों में छापेमारी के दौरान मुख्यमंत्री के कथित हस्तक्षेप के मामले की सुनवाई कर रही थी। कोर्ट ने संकेत दिया कि राज्य और केंद्र के बीच यह खींचतान संघीय ढांचे के लिए हानिकारक है।

I-PAC रेड विवाद: ईडी बनाम पश्चिम बंगाल सरकार का नया मोर्चा

विवाद की जड़ें जनवरी की शुरुआत में हुई उस छापेमारी से जुड़ी हैं, जब ईडी ने मनी लॉन्ड्रिंग जांच के तहत तृणमूल कांग्रेस (TMC) के साथ काम करने वाली फर्म ‘इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी’ (I-PAC) के दफ्तरों पर दस्तक दी थी। ईडी ने आरोप लगाया है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और राज्य के वरिष्ठ अधिकारियों ने इस तलाशी अभियान में जानबूझकर बाधा उत्पन्न की। एजेंसी का दावा है कि राज्य पुलिस का इस्तेमाल केंद्रीय अधिकारियों को डराने और जांच की दिशा मोड़ने के लिए किया गया, जो न्याय की प्रक्रिया में सीधा हस्तक्षेप है।

राज्य पुलिस की भूमिका और जांच में बाधा पर सुप्रीम कोर्ट की चिंता

अदालत ने याचिका की मेंटेनेबिलिटी (रखरखाव) पर सवाल उठाने वाली राज्य सरकार से पूछा कि क्या मुख्यमंत्री द्वारा ईडी के छापे में बाधा डालने की स्थिति में केंद्रीय एजेंसी को राज्य पुलिस के पास जाने का अधिकार नहीं है? अदालत ने इस बात पर हैरानी जताई कि एक संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति जांच एजेंसी के काम में कैसे अवरोध पैदा कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी पूछा कि जब राज्य मशीनरी ही जांच में रोड़ा बने, तो निष्पक्ष न्याय की उम्मीद कैसे की जा सकती है।

SIR कार्यान्वयन पर सीजेआई की टिप्पणी: बंगाल में ही क्यों है समस्या?

इसी सत्र के दौरान पश्चिम बंगाल से जुड़े ‘सोशल इम्पैक्ट रिपोर्ट’ (SIR) के मामले में मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने भी तीखी टिप्पणी की। सीजेआई ने कहा कि पश्चिम बंगाल को छोड़कर देश के अन्य सभी राज्यों में SIR का कार्यान्वयन सुचारू रूप से चल रहा है और वहां इसे लेकर कोई विशेष मुकदमेबाजी नहीं हो रही है। उन्होंने आश्चर्य व्यक्त किया कि ‘तार्किक विसंगति’ जैसे तर्क केवल पश्चिम बंगाल में ही क्यों लागू किए जा रहे हैं। राज्य के वकीलों के तर्कों पर असहमति जताते हुए अदालत ने प्रशासन की कार्यशैली पर सवालिया निशान लगाए।

संघीय ढांचे और जांच की स्वायत्तता का संरक्षण

सुप्रीम कोर्ट का यह कड़ा रुख दर्शाता है कि न्यायपालिका जांच एजेंसियों की स्वायत्तता और उनके अधिकारियों के मानवाधिकारों को लेकर बेहद गंभीर है। आई-पैक मामले में ममता सरकार की आपत्तियों ने एक बड़ी बहस को जन्म दे दिया है कि राज्य और केंद्र की शक्तियों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या राज्य सरकार अपने रुख में बदलाव करती है या यह कानूनी लड़ाई और लंबी खिंचती है।

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