SC Decision on Conversion: देश की सर्वोच्च अदालत ने हाल ही में अनुसूचित जाति (SC) के दर्जे और धर्मांतरण को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट की है। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की बेंच ने अपने फैसले में साफ कर दिया है कि यदि अनुसूचित जाति से संबंधित कोई व्यक्ति हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म को छोड़कर किसी अन्य धर्म (जैसे ईसाई या इस्लाम) को अपनाता है, तो वह उसी क्षण अपना SC होने का संवैधानिक दर्जा खो देता है।
अदालत ने आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के पुराने आदेश को बरकरार रखते हुए यह स्पष्ट किया कि संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के अनुच्छेद 3 के तहत, आरक्षण और अन्य लाभ केवल उन्हीं वर्गों के लिए सीमित हैं जो हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म का पालन करते हैं।
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क्या ‘घर वापसी’ से वापस मिल सकता है आरक्षण?
कानूनी गलियारों में यह सवाल अक्सर उठता है कि क्या कोई व्यक्ति दोबारा अपने मूल धर्म (हिंदू, सिख या बौद्ध) में लौटता है, तो क्या उसे फिर से अनुसूचित जाति का दर्जा मिल सकता है? सुप्रीम कोर्ट ने इस पर अपनी सहमति तो दी है, लेकिन इसके लिए 3 कड़ी शर्तें रखी हैं। इन शर्तों को पूरा किए बिना कोई भी व्यक्ति पुराने लाभों का दावा नहीं कर सकता:
मूल जाति का प्रमाण
व्यक्ति को कानूनी रूप से यह साबित करना होगा कि उसका जन्म मूल रूप से उसी जाति में हुआ था, जो राष्ट्रपति द्वारा जारी अनुसूचित जाति की सूची में शामिल है।
वास्तविक धर्मांतरण
उसे यह स्पष्ट करना होगा कि उसने अपने पिछले धर्म (जैसे ईसाई या इस्लाम) को पूरी तरह त्याग दिया है और अब वह सच्चे मन से हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म का पालन कर रहा है।
सामाजिक स्वीकार्यता (सबसे महत्वपूर्ण शर्त): व्यक्ति को यह प्रमाणित करना होगा कि उसकी मूल जाति के अन्य सदस्यों और बिरादरी ने उसे फिर से अपनी जाति के हिस्से के रूप में स्वीकार कर लिया है। यदि समाज उसे स्वीकार नहीं करता, तो केवल धर्म परिवर्तन उसे SC का दर्जा वापस नहीं दिला पाएगा।
पूरा मामला
यह पूरा विवाद आंध्र प्रदेश के एक मामले से शुरू हुआ। पादरी सी आनंद, जिनका जन्म एक अनुसूचित जाति परिवार में हुआ था, ने बाद में ईसाई धर्म अपना लिया और चर्च में सेवा देने लगे। 2021 में, उन्होंने ए आर रेड्डी नामक व्यक्ति के खिलाफ एससी/एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज कराया, जिसमें आरोप लगाया गया कि प्रार्थना के दौरान उन पर हमला हुआ।
निचली अदालत और आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने इस मामले में हस्तक्षेप करते हुए कहा कि चूंकि आनंद अब एक ईसाई पादरी हैं और सक्रिय रूप से उस धर्म का पालन कर रहे हैं, इसलिए वे एससी/एसटी एक्ट के तहत सुरक्षा या आरक्षण के हकदार नहीं रह जाते। सुप्रीम कोर्ट ने भी इसी तर्क को सही माना और उनकी याचिका को खारिज कर दिया।
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