Sabarimala Case 2026 : सबरीमाला पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा सवाल, क्या परंपराएं संविधान के मौलिक अधिकारों से ऊपर हैं?

सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की विशेष पीठ के सामने चल रही सुनवाई ने पूरे देश का ध्यान खींचा है। परंपराओं की रक्षा और संवैधानिक समानता के बीच छिड़ी इस कानूनी बहस में क्या जीत आस्था की होगी या बदलाव की नई बयार बहेगी? पूरी रिपोर्ट।

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

अप्रैल 15, 2026

Sabarimala Case 2026 :  केरल के प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है। मंदिर का प्रबंधन संभालने वाले त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने अपनी दलीलें पेश कीं। सिंघवी ने पुरजोर तरीके से कहा कि किसी धर्म की परंपरा या प्रथा सही है या गलत, इसका निर्धारण केवल उस विशिष्ट समुदाय की आस्था और विश्वास के आधार पर ही किया जाना चाहिए। उन्होंने तर्क दिया कि न्यायाधीशों को स्वयं यह तय करने की भूमिका में नहीं आना चाहिए कि किसी विशेष धर्म के लिए क्या अनिवार्य है और क्या नहीं। सिंघवी के अनुसार, धर्म एक सामूहिक आस्था का विषय है, इसलिए कुछ व्यक्तियों के अधिकारों को पूरे समुदाय की सदियों पुरानी धार्मिक मान्यताओं पर हावी होने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

केंद्र सरकार का रुख: धार्मिक परंपराओं और विविधता का सम्मान जरूरी

इससे पहले अप्रैल माह के पहले सप्ताह में हुई तीन दिवसीय सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने भी धार्मिक परंपराओं के संरक्षण का समर्थन किया था। सरकार की ओर से दलील दी गई कि भारत एक विविधताओं वाला देश है, जहां कई ऐसे मंदिर हैं जहां पुरुषों का प्रवेश वर्जित है। यदि उन स्थानों पर पुरुषों के प्रवेश पर प्रतिबंध को परंपरा माना जाता है, तो सबरीमाला की विशिष्ट परंपरा का भी सम्मान किया जाना चाहिए। गौरतलब है कि 1991 में केरल हाईकोर्ट ने 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं के प्रवेश पर रोक लगा दी थी, जिसे 2018 में सुप्रीम कोर्ट की एक पीठ ने भेदभावपूर्ण करार देते हुए हटा दिया था। वर्तमान सुनवाई उन्हीं फैसलों के खिलाफ दायर पुनर्विचार याचिकाओं और सात महत्वपूर्ण संवैधानिक सवालों पर आधारित है।

जस्टिस बागची की टिप्पणी: धार्मिक अधिकारों की सीमाएं और ‘Subject To’ का अर्थ

सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने संविधान के अनुच्छेद 26 में प्रयुक्त ‘Subject To’ (के अधीन) शब्द की व्याख्या पर जोर दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि धार्मिक संस्थाओं के अधिकार पूरी तरह से निरंकुश या स्वतंत्र नहीं हैं। उन पर सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के आधार पर कुछ सीमाएं लागू होती हैं। अदालत इस बात की जांच कर रही है कि क्या मंदिर की परंपराएं इन संवैधानिक सीमाओं के भीतर आती हैं या वे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती हैं। बेंच इस बात पर गहराई से विचार कर रही है कि धार्मिक स्वायत्तता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच की रेखा कहां खींची जानी चाहिए।

जस्टिस नागरत्ना का दृष्टिकोण: हर व्यक्ति की आस्था का समान महत्व

जस्टिस नागरत्ना ने अनुच्छेद 25 की व्यापकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह अनुच्छेद सभी धर्मों पर समान रूप से लागू होता है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि संविधान की नजर में कोई भी धर्म श्रेष्ठ या निम्न नहीं है। उन्होंने एक दार्शनिक और कानूनी पक्ष रखते हुए कहा कि ‘सच्चाई एक हो सकती है, लेकिन विभिन्न लोग उसे अपने-अपने नजरिए से समझते हैं।’ इसका तात्पर्य यह है कि हर व्यक्ति को अपनी आस्था रखने का मौलिक अधिकार है, लेकिन यह अधिकार दूसरों के अधिकारों के साथ कैसे तालमेल बिठाता है, यही इस मामले का मुख्य बिंदु है।

अधिकारों का टकराव और संतुलन: सिंघवी की संवैधानिक व्याख्या

बहस को आगे बढ़ाते हुए अभिषेक मनु सिंघवी ने स्वीकार किया कि कई बार संवैधानिक अधिकारों के बीच टकराव की स्थिति पैदा हो जाती है। विशेष रूप से अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता), अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) एक-दूसरे के विपरीत खड़े हो सकते हैं। सिंघवी ने सुझाव दिया कि कोर्ट की प्राथमिकता इन सभी अधिकारों के बीच एक न्यायसंगत संतुलन बनाने की होनी चाहिए। हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि यदि संतुलन संभव न हो, तो अनुच्छेद 25 में उल्लिखित ‘Subject To’ के प्रावधानों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, जिसका अर्थ है कि व्यापक जनहित में धार्मिक अधिकारों को सीमित किया जा सकता है। फिलहाल, सभी की नजरें इस संवैधानिक पीठ के अंतिम निष्कर्ष पर टिकी हैं।

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