RTI Alert: सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम लोकतंत्र की रीढ़ है, लेकिन अक्सर सरकारी विभागों की सुस्ती के कारण आवेदकों को सूचना पाने के लिए महीनों चक्कर काटने पड़ते हैं। अब हरियाणा राज्य सूचना आयोग ने ऑनलाइन आरटीआई आवेदनों की अनदेखी और देरी को लेकर बेहद सख्त रुख अपनाया है। आयोग ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि ऑनलाइन दाखिल किसी आवेदन पर 30 दिनों के भीतर कोई कार्रवाई नहीं होती, तो इसे सूचना देने से ‘इन्कार’ (Deemed Refusal) माना जाएगा। यह सख्त टिप्पणी एक सुनवाई के दौरान की गई, जिसमें एक आवेदक को मांगी गई जानकारी प्राप्त करने के लिए छह महीने तक इंतजार करना पड़ा था।
Haryana News: 30 दिनों के भीतर नहीं कराया यह काम, तो रुक जाएगी आपकी पेंशन!
प्रशासनिक लापरवाही पर आयोग की कड़ी फटकार
हालिया मामले में, जब आरटीआई आवेदक ने देरी की शिकायत की, तो संबंधित विभागीय अधिकारी ने अजीबोगरीब दलील दी कि आवेदन ऑनलाइन पोर्टल के जरिए आया था, लेकिन कार्यालय तक इसकी सूचना ही नहीं पहुंची। सूचना आयुक्त डॉ. अजय सूरा ने इस दलील को सिरे से खारिज करते हुए इसे ‘गंभीर प्रशासनिक विफलता’ करार दिया। आयोग ने साफ तौर पर कहा कि तकनीक का बहाना बनाकर जवाबदेही से नहीं बचा जा सकता। आरटीआई अधिनियम के अनुसार, सामान्य मामलों में 30 दिन और यदि मामला किसी व्यक्ति के जीवन या स्वतंत्रता से जुड़ा हो, तो 48 घंटे के भीतर सूचना देना अनिवार्य है। आयोग के सामने ऐसे कई मामले आ रहे हैं जहां विभाग तब तक नींद से नहीं जागते, जब तक कि आयोग का नोटिस न पहुंच जाए।
भविष्य के लिए चेतावनी और सख्त दिशा-निर्देश
यद्यपि संबंधित मामले में आवेदक को सूचना मिल चुकी थी, इसलिए आयोग ने इस बार दंडात्मक कार्रवाई से परहेज किया, लेकिन संबंधित लोक सूचना अधिकारी (SPIO) को भविष्य के लिए कड़ी चेतावनी दी गई है। यह आदेश केवल एक मामले तक सीमित नहीं है। राज्य सूचना आयोग ने हरियाणा के मुख्य सचिव को पत्र लिखकर निर्देश दिए हैं कि वे राज्य के सभी विभागों को सूचित करें। इसके तहत सभी विभागों के एस.पी.आई.ओ. के लिए यह अनिवार्य होगा कि वे अपने ऑनलाइन पोर्टल की नियमित निगरानी करें और आवेदनों का समयबद्ध तरीके से निपटान सुनिश्चित करें।
ऑनलाइन पोर्टल और जवाबदेही
हरियाणा सरकार ने जनवरी 2022 में पारदर्शिता बढ़ाने और प्रक्रिया को सरल बनाने के लिए ऑनलाइन आरटीआई पोर्टल की शुरुआत की थी। पोर्टल का उद्देश्य आम जनता और सरकारी विभागों के बीच की दूरी कम करना था, लेकिन प्रशासनिक शिथिलता ने इस उद्देश्य को बाधित किया है। आयोग का यह आदेश इस बात का प्रतीक है कि अब ‘तकनीकी खामी’ का बहाना सरकारी अधिकारियों के लिए एक ढाल नहीं बनेगा।
यह निर्णय उन हजारों आरटीआई आवेदकों के लिए एक बड़ी जीत है जो सरकारी दफ्तरों की फाइलों में अपने आवेदन खो जाने का डर रखते थे। अब किसी भी आवेदन को नजरअंदाज करना संबंधित अधिकारी को भारी पड़ सकता है, क्योंकि अब जवाब न मिलना सीधे तौर पर सूचना के अधिकार का उल्लंघन माना जाएगा। सरकार के इस कदम से पारदर्शिता का स्तर बढ़ने और अधिकारियों में जवाबदेही की संस्कृति मजबूत होने की उम्मीद है।
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