Mohan Bhagwat Statement: भारत-पाक बंटवारा सबसे बड़ी भूल था, आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत का बड़ा दावा

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने पाकिस्तान को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने दत्तात्रेय होसबले के 'संवाद की खिड़की खुली रखने' वाले विचार का समर्थन किया। भागवत ने कहा कि पाकिस्तान का एक बड़ा वर्ग बंटवारे को भूल मानता है और युद्ध में जीत के बाद भी संवाद का रास्ता जरूरी रहेगा।

Mohan Bhagwat Statement

Wrriten By :

Aanchal Singh

Published On :

जून 14, 2026

Mohan Bhagwat Statement: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने पड़ोसी देश पाकिस्तान और भारत के कूटनीतिक रिश्तों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और दूरगामी बयान दिया है। संघ प्रमुख ने संगठन के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबले के उस नीतिगत विचार का खुलकर समर्थन किया है, जिसमें उन्होंने पाकिस्तान के साथ संवाद और बातचीत का रास्ता पूरी तरह बंद न करने की वकालत की थी।

केरल के तिरुवनंतपुरम में आरएसएस के सौ साल (शताब्दी वर्ष) पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित एक विशेष व्याख्यान कार्यक्रम में मोहन भागवत ने इस संवेदनशील मुद्दे पर संघ की स्थिति पूरी तरह स्पष्ट की। उन्होंने रेखांकित किया कि होसबले के बयान का तात्पर्य पाकिस्तान की सैन्य हुकूमत या वहां के राजनीतिक आकाओं से वार्ता करने का बिल्कुल नहीं था, बल्कि उनका सीधा इशारा सीमा पार रहने वाले आम नागरिकों, पीड़ित समाज और वहां के बुद्धिजीवियों की तरफ था।

संघ की कोई समानांतर विदेश नीति नहीं

जब शताब्दी समारोह के दौरान संघ प्रमुख से दत्तात्रेय होसबले के पुराने साक्षात्कार और इस पर आरएसएस की आधिकारिक सोच को लेकर सीधा सवाल दागा गया, तो उन्होंने बहुत नपा-तुला और कूटनीतिक जवाब दिया। मोहन भागवत ने साफ किया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दुनिया के किसी भी देश के साथ द्विपक्षीय रिश्तों को लेकर अपनी कोई अलग से समानांतर विदेश नीति (Foreign Policy) नहीं चलाता है। अंतरराष्ट्रीय मामलों और कूटनीति के मोर्चे पर संगठन हमेशा नई दिल्ली की केंद्र सरकार के फैसलों और देश की संप्रभु नीतियों का ही पूरी निष्ठा से समर्थन करता है।

हालांकि, इसके साथ ही उन्होंने पाकिस्तान के आंतरिक सामाजिक ताने-बाने को लेकर एक बड़ा दावा किया। उन्होंने कहा कि भौगोलिक सीमा के पार आज भी एक बहुत बड़ा नागरिक वर्ग ऐसा मौजूद है जो दिल से यह स्वीकार करता है कि 1947 में भारत और पाकिस्तान का बंटवारा एक ऐतिहासिक और बहुत बड़ी भूल थी। वहां के कई निष्पक्ष बुद्धिजीवी, प्रोफेसर और पत्रकार भी संघ के जमीनी सामाजिक कार्यों की अंदरखाने सराहना करते हैं।

भविष्य के सामरिक हालातों और युद्ध के बाद का रोडमैप

भविष्य के सामरिक हालातों और भू-राजनीतिक परिवर्तनों की चर्चा करते हुए संघ प्रमुख ने एक बेहद दिलचस्प और दार्शनिक नजरिया देश के सामने रखा। उन्होंने कहा कि अगर आने वाले समय में किसी अनिवार्य युद्ध की स्थिति बनती है और भारत अपने सैन्य पराक्रम से पाकिस्तान को पूरी तरह परास्त कर देता है, तो उसके बाद वहां की पराजित जनता को संभालने के लिए हमारे पास केवल दो ही विकल्प शेष बचेंगे। पहला रास्ता यह होगा कि ‘अखंड भारत’ की सोच के तहत उन्हें वापस भारत का हिस्सा बना लिया जाए, या फिर दूसरा रास्ता यह होगा कि उन्हें उनके ही मुल्क की भौगोलिक सीमाओं के भीतर अमन-चैन और गरिमा से रहने का अनुकूल अवसर दिया जाए। भागवत ने जोर देकर कहा कि इन दोनों ही परिस्थितियों में वहां के समाज से संवाद का रास्ता खुला होना बेहद जरूरी है।

इतिहास और वैश्विक तानाशाहों का दिया उदाहरण

इतिहास और वैश्विक तानाशाहों का उदाहरण देते हुए आरएसएस प्रमुख ने भारत की सांस्कृतिक और सनातन सोच की विशिष्टता को सामने रखा। उन्होंने कहा कि वैश्विक इतिहास गवाह है कि भारत की विस्तारवादी सोच जर्मनी के तानाशाह एडॉल्फ हिटलर जैसी विनाशकारी और नस्लीय नरसंहार वाली कभी नहीं रही। हमारा मूल लक्ष्य समाज से अत्याचार, मजहबी कट्टरपंथ और आतंकवाद जैसी बुराई को जड़ से मिटाना है, लेकिन युद्ध की विभीषिका के बीच भी वहां जो कुछ भी मानवीय अच्छाई या भारतीय मूल्य बचे हैं, उन्हें सहेजना और संरक्षण देना भी हमारी सांस्कृतिक जिम्मेदारी है। इसी कारण बातचीत की खिड़की खुली रहनी चाहिए।

दत्तात्रेय होसबले के इंटरव्यू से शुरू हुआ था सियासी विवाद

इस पूरे वैचारिक और राजनीतिक विवाद की शुरुआत मई के महीने में आरएसएस के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबले द्वारा दिए गए एक बहुचर्चित इंटरव्यू से हुई थी। जब मीडिया द्वारा उनसे पूछा गया था कि सीमा पार से प्रायोजित होने वाले छद्म आतंकवाद और पाकिस्तान की नापाक हरकतों का भारत को क्या माकूल जवाब देना चाहिए, तब उन्होंने देश की आंतरिक सुरक्षा और सैन्य संप्रभुता को सर्वोपरि बताया था।

उन्होंने स्पष्ट कहा था कि सरकार को देश के मान-सम्मान और सुरक्षा से रत्ती भर भी समझौता नहीं करना चाहिए। लेकिन इसके साथ ही उन्होंने एक दूरदर्शी कूटनीतिक बात जोड़ी थी कि हमें बातचीत के गलियारों को हमेशा के लिए पूरी तरह बंद नहीं करना चाहिए। संकट और तनाव चाहे कितना भी चरम पर हो, बैक-चैनल डिप्लोमेसी और संवाद का एक जरिया हमेशा जीवित रखना चाहिए। अब संघ प्रमुख के इस खुली पैरवी के बाद देश के राजनीतिक गलियारों में इसके गहरे सियासी और रणनीतिक मायने तलाशे जा रहे हैं।