West Bengal Politics : पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष (LoP) की नियुक्ति को लेकर चल रहा राजनीतिक और कानूनी विवाद अब एक नए मोड़ पर पहुंच चुका है। गुरुवार (11 जून, 2026) को इस संवेदनशील मामले पर सुनवाई करते हुए कलकत्ता उच्च न्यायालय ने एक बड़ा और दूरगामी फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) की याचिका पर तत्काल राहत देने से पूरी तरह मना कर दिया है। अदालत ने विधानसभा अध्यक्ष द्वारा की गई नियुक्ति पर फिलहाल कोई भी स्टे (रोक) लगाने से साफ इनकार कर दिया। इसका सीधा तकनीकी मतलब यह है कि टीएमसी के बागी विधायक ऋतब्रत बनर्जी फिलहाल पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता के पद पर बने रहेंगे। अदालत का यह आदेश तृणमूल कांग्रेस और ममता बनर्जी के लिए एक बहुत बड़ा सियासी झटका माना जा रहा है।
सत्ता परिवर्तन और विपक्ष का गणित
इस पूरे कानूनी घमासान की जड़ें हाल ही में संपन्न हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों से जुड़ी हुई हैं। सूबे में हुए सत्ता परिवर्तन के बाद भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने पूर्ण बहुमत के साथ राज्य में अपनी नई सरकार का गठन किया है। इसके साथ ही, पिछले 15 सालों से बंगाल की सत्ता पर एकछत्र राज करने वाली ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस सत्ता से बाहर होकर मुख्य विपक्षी दल की भूमिका में आ गई। मुख्य विपक्षी पार्टी होने के नाते टीएमसी ने आधिकारिक तौर पर नेता प्रतिपक्ष की अहम जिम्मेदारी अपने वरिष्ठ नेता सोवंदेब चट्टोपाध्याय को सौंपी थी। हालांकि, राजनीतिक समीकरण उस वक्त पूरी तरह बदल गए जब विधानसभा के अध्यक्ष (स्पीकर) रथींद्रनाथ बोस ने एक अप्रत्याशित फैसला लेते हुए टीएमसी के बागी नेता ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता दे दी।
तृणमूल कांग्रेस का तीखा विरोध
विधानसभा अध्यक्ष रथींद्रनाथ बोस द्वारा पार्टी के बागी विधायक ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता देने का फैसला तृणमूल कांग्रेस को बिल्कुल रास नहीं आया और पार्टी ने इसके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। टीएमसी का कड़ा तर्क है कि सदन के भीतर नेता प्रतिपक्ष की नियुक्ति पूरी तरह से विपक्षी दल का विशेषाधिकार होता है और स्पीकर इसमें अपनी मर्जी या पसंद नहीं थोप सकते। पार्टी ने आधिकारिक बयान में कहा कि इस तरह की संवैधानिक नियुक्ति के लिए सदन में विपक्षी पार्टियों के पास मौजूद विधायकों की वास्तविक संख्या और राजनीतिक जमीनी हकीकत को देखना अनिवार्य कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा है।
लोकतांत्रिक परंपराएं टूटने का दावा
इस पूरे घटनाक्रम को लेकर तृणमूल कांग्रेस ने बंगाल विधानसभा के स्पीकर रथींद्रनाथ बोस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। टीएमसी नेतृत्व का सीधा आरोप है कि स्पीकर ने एक बागी नेता को यह अत्यंत महत्वपूर्ण और कैबिनेट स्तर का पद देकर सदन की दशकों पुरानी लोकतांत्रिक परंपराओं को तार-तार किया है और राज्य के राजनीतिक संतुलन को जानबूझकर बिगाड़ने का प्रयास किया है। हालांकि, इस मामले में कानूनी लड़ाई अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। कलकत्ता हाईकोर्ट ने इस मामले की अगली विस्तृत सुनवाई पांच दिन बाद, यानी मंगलवार (16 जून, 2026) को तय की है। माना जा रहा है कि उस दिन दोनों पक्षों की अंतिम दलीलें सुनने के बाद माननीय अदालत इस विवाद पर कोई बेहद बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुना सकती है, जिस पर पूरे देश की राजनीतिक नजरें टिकी हुई हैं।
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