लंबे समय तक सहमति से संबंध के बाद शादी से मुकरना अपराध नहीं: हाई कोर्ट

उत्तराखंड उत्तराखंड हाई कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा है कि सहमति से लंबे समय तक संबंध बनाने के बाद शादी का वादा तोड़ना रेप नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि जब दो व्यस्कों के बीच सहमति से संबंध नते हैं तो रेप केस के लिए यह साबित करना जरूरी है कि शादी का वादा शुरू से ही झूठा था। रिपोर्ट के अनुसार, उत्तराखंड हाई कोर्ट ने कहा है कि जब दो वयस्क आपसी सहमति से लंबे समय तक संबंध में हों तो शादी के वादे को पूरा न करना आईपीसी की धारा 376 के तहत बलात्कार

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Published On :

फ़रवरी 15, 2026

उत्तराखंड
उत्तराखंड हाई कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा है कि सहमति से लंबे समय तक संबंध बनाने के बाद शादी का वादा तोड़ना रेप नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि जब दो व्यस्कों के बीच सहमति से संबंध नते हैं तो रेप केस के लिए यह साबित करना जरूरी है कि शादी का वादा शुरू से ही झूठा था।

रिपोर्ट के अनुसार, उत्तराखंड हाई कोर्ट ने कहा है कि जब दो वयस्क आपसी सहमति से लंबे समय तक संबंध में हों तो शादी के वादे को पूरा न करना आईपीसी की धारा 376 के तहत बलात्कार नहीं माना जा सकता, जब तक कि यह साबित न हो जाए कि वादा शुरू से ही झूठा था। इस मामले में मसूरी की एक महिला ने सूरज बोरा नामक आदमी पर शादी का झांसा देकर शारीरिक संबंध बनाने का आरोप लगाया। बोरा ने 45 दिनों के भीतर शादी का आश्वासन देने के बाद बाद में इनकार कर दिया। जांच के बाद पुलिस ने आरोप पत्र दायर किया जिसे बोरा ने हाई कोर्ट में चुनौती दी।

बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि दोनों पक्ष वयस्क थे और लंबे समय से आपसी सहमति से संबंध बनाए हुए थे। एफआईआर में ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं है जिससे यह पता चले कि रिश्ते की शुरुआत में आरोपी का इरादा कपटपूर्ण था। यह केवल एक असफल रिश्ता था और आपराधिक कार्यवाही शुरू करना कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।

दूसरी ओर, राज्य सरकार और पीड़िता का प्रतिनिधित्व करने वाले वकीलों ने याचिका का विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि पीड़िता की सहमति पूरी तरह से शादी के आश्वासन पर आधारित थी, जिसे आरोपी बाद में पूरा करने में विफल रहा। उन्होंने आगे कहा कि क्या वादा शुरू से ही झूठा था, यह केवल मुकदमे के दौरान सबूतों के आधार पर ही निर्धारित किया जा सकता है। इसलिए, कार्यवाही को रद्द नहीं किया जाना चाहिए।

जस्टिस आशीष नैथानी ने सुनवाई के दौरान कहा कि किसी वयस्क महिला द्वारा दी गई सहमति मात्र इसलिए अमान्य नहीं हो जाती क्योंकि संबंध शादी में नहीं बदला। इसे धारा 376 के तहत अपराध मानने के लिए यह सिद्ध करना आवश्यक है कि शादी का वादा केवल संबंध बनाने के लए सहमति पाने का एक साधन था और आरोपी का शादी करने का कोई इरादा नहीं था।

कोर्ट ने पाया कि दोनों पक्ष लंबे समय से रिश्ते में थे और उनके बीच बार-बार शारीरिक संबंध बने थे, जिससे प्रारंभिक धोखाधड़ी के बजाय आपसी सहमति का संकेत मिलता है। हाई कोर्ट ने यह निर्धारित किया कि ठोस आधार के अभाव में आपराधिक कार्यवाही जारी रखना आरोपी का उत्पीड़न होगा। हाई कोर्ट ने देहरादून के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष लंबित आपराधिक मामला और सूरज बोरा के खिलाफ 22 जुलाई 2023 की चार्जशीट को पूरी तरह रद्द कर दिया।

 

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