Rajya Sabha Election 2026: देश के उच्च सदन यानी राज्यसभा के लिए 2026 का चुनावी रण तैयार हो चुका है। आगामी 16 मार्च को 10 राज्यों की रिक्त पड़ी 37 सीटों को भरने के लिए प्रक्रिया शुरू होगी। हालांकि, दिलचस्प बात यह है कि चुनावी मुकाबला केवल तीन राज्यों बिहार, ओडिशा और हरियाणा की 11 सीटों पर सिमट गया है। अन्य 7 राज्यों में उम्मीदवारों का निर्विरोध चुना जाना लगभग तय माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों की नजरें उन सीटों पर टिकी हैं जहाँ संख्या बल का अंतर कम है और ‘क्रॉस वोटिंग’ की संभावना अधिक है। सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों ही अपने कुनबे को बचाने और निर्दलीयों को साधने में जुटे हुए हैं।
ओडिशा: चौथी सीट के लिए दिलीप राय और दत्तेश्वर होता में जंग
ओडिशा में राज्यसभा की 4 सीटों के लिए बिसात बिछ चुकी है। यहाँ भाजपा दो और बीजू जनता दल (बीजेडी) एक सीट आसानी से जीत सकती है, लेकिन असली पेंच चौथी सीट पर फंसा है। भाजपा समर्थित निर्दलीय प्रत्याशी दिलीप राय और बीजेडी के दत्तेश्वर होता के बीच सीधा मुकाबला है। एक सीट जीतने के लिए 30 मतों की आवश्यकता है। भाजपा के पास अपने 79 और 3 निर्दलीय विधायकों के साथ कुल 82 वोट हैं। दो सीटों के बाद भाजपा के पास 22 वोट बचते हैं, जिसका अर्थ है कि दिलीप राय को जीत के लिए 8 और वोटों की दरकार है। वहीं बीजेडी के पास 48 विधायक हैं और उन्हें जीत के लिए 12 अतिरिक्त वोटों की जरूरत है। यहाँ कांग्रेस (14 वोट) और माकपा (1 वोट) की भूमिका निर्णायक होने वाली है।
बिहार: नीतीश कुमार की भूमिका और कुशवाहा बनाम अमरेंद्र धारी
बिहार का राज्यसभा चुनाव इस बार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राजनीतिक दांव-पेंच के कारण सबसे अधिक सुर्खियों में है। यहाँ 5 सीटों के लिए 6 उम्मीदवार मैदान में उतर आए हैं, जिससे मुकाबला रोमांचक हो गया है। एनडीए (NDA) के पास 202 विधायक हैं और प्रत्येक सीट के लिए 41 वोटों की जरूरत है। भाजपा और जेडीयू के दो-दो उम्मीदवारों की जीत तय है, लेकिन पांचवीं सीट पर एनडीए के उपेंद्र कुशवाहा और आरजेडी के अमरेंद्र धारी सिंह के बीच कांटे की टक्कर है। एनडीए को जीत के लिए 3 और आरजेडी को 6 अतिरिक्त वोटों की आवश्यकता है। ऐसी स्थिति में बसपा का 1 और ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम (AIMIM) के 5 विधायक किंगमेकर की भूमिका निभा सकते हैं।
हरियाणा: क्या कांग्रेस के खेमे में फिर होगी सेंधमारी?
हरियाणा में कांग्रेस के लिए इतिहास खुद को दोहराता दिख रहा है। 2016 और 2022 के चुनावों में कांग्रेस को भीतरघात के कारण बड़ा झटका लगा था और इस बार भी खतरे के बादल मंडरा रहे हैं। यहाँ 2 सीटों के लिए भाजपा के संजय भाटिया और कांग्रेस के कर्मवीर बौद्ध मैदान में हैं, लेकिन तीसरे खिलाड़ी के तौर पर निर्दलीय सतीश नांदल ने एंट्री मारकर कांग्रेस की नींद उड़ा दी है। सतीश नांदल, जो पहले भूपेंद्र सिंह हुड्डा के खिलाफ चुनाव लड़ चुके हैं, उन्हें भाजपा का मौन समर्थन प्राप्त माना जा रहा है। कांग्रेस के पास 37 वोट हैं और जीत के लिए 31 वोट चाहिए, लेकिन नांदल की मौजूदगी से ‘क्रॉस वोटिंग’ का खतरा बढ़ गया है।
क्षेत्रीय दलों और निर्दलीयों के हाथ में सत्ता की चाबी
इन चुनावों ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि उच्च सदन की राह छोटी पार्टियों और निर्दलीय विधायकों के समर्थन के बिना आसान नहीं है। बिहार में जहाँ छोटे दल गठबंधन की मजबूती तय करेंगे, वहीं ओडिशा में कांग्रेस का रुख यह स्पष्ट करेगा कि वह नवीन पटनायक की पार्टी को समर्थन देगी या भाजपा के ‘ऑपरेशन लोटस’ के लिए रास्ता साफ होगा। 16 मार्च की शाम तक यह स्पष्ट हो जाएगा कि किस दल की रणनीति सफल रही और कौन अपने विधायकों को एकजुट रखने में विफल रहा।
भविष्य के समीकरण और उच्च सदन का शक्ति संतुलन
इन 11 सीटों के परिणाम न केवल राज्यसभा के भीतर शक्ति संतुलन को प्रभावित करेंगे, बल्कि आगामी विधानसभा चुनावों के लिए भी मनोवैज्ञानिक बढ़त प्रदान करेंगे। यदि भाजपा हरियाणा और ओडिशा में अतिरिक्त सीटें जीतने में सफल रहती है, तो यह विपक्ष के लिए एक बड़ा नैतिक झटका होगा। फिलहाल, सभी दलों ने अपने विधायकों की घेराबंदी शुरू कर दी है और रिसॉर्ट पॉलिटिक्स की सुगबुगाहट भी तेज हो गई है।
Read More : Lok Sabha Speaker Om Birla: लोकसभा स्पीकर की कुर्सी पर संकट के बादल? बजट सत्र से पहले सियासी हलचल तेज









