Raja Raghuvanshi Murder Case: इंदौर के चर्चित व्यापारी राजा रघुवंशी मर्डर मामले में उनकी आरोपी पत्नी सोनम रघुवंशी को देश की शीर्ष अदालत से बहुत बड़ा झटका लगा है। उच्चतम न्यायालय ने सोनम रघुवंशी की जमानत को पूरी तरह से रद्द कर दिया है। जस्टिस की पीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए आरोपी महिला को आगामी तीन सप्ताह के भीतर संबंधित अदालत या पुलिस के समक्ष सरेंडर (आत्मसमर्पण) करने का कड़ा आदेश जारी किया है। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला मेघालय सरकार द्वारा दायर की गई विशेष अनुमति याचिका पर सुनवाई के बाद आया है, जिसमें सोनम को निचली अदालत से मिली राहत को चुनौती दी गई थी।
फास्ट ट्रैक ट्रायल के निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने न सिर्फ आरोपी की बेल याचिका को खारिज किया, बल्कि इस पूरे हत्याकांड के कानूनी ट्रायल को लेकर भी सख्त दिशा-निर्देश जारी किए हैं। शीर्ष अदालत ने आदेश दिया है कि इस हाई-प्रोफाइल मर्डर केस का ट्रायल अगले 6 महीने के भीतर अनिवार्य रूप से पूरा किया जाए। अदालत ने आरोपी को थोड़ी राहत देते हुए यह भी जोड़ा कि यदि किन्हीं कारणों से आगामी छह महीनों में मामले की न्यायिक प्रक्रिया या ट्रायल पूरा नहीं हो पाता है, तो सोनम रघुवंशी कानूनन दोबारा से अपनी नियमित जमानत के लिए याचिका दाखिल करने की हकदार होंगी। हालांकि, वर्तमान में उन्हें 3 हफ्ते में आत्मसमर्पण करना ही होगा।
बचाव पक्ष की दलीलें
इस मामले की सुनवाई के दौरान मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने सोनम रघुवंशी के कानूनी सलाहकार (वकील) के सामने दो बेहद स्पष्ट विकल्प रखे थे। कोर्ट ने पूछा था कि क्या आरोपी सोनम खुद स्वेच्छा से आत्मसमर्पण करेगी या फिर अदालत सीधे उसकी जमानत रद्द करने पर अपना अंतिम फैसला सुनाए। दूसरी तरफ, आरोपी सोनम रघुवंशी ने अदालत में लिखित जवाब दाखिल कर खुद को पूरी तरह बेगुनाह और निर्दोष बताया है। सोनम का दावा है कि उसे इस हत्याकांड में दुर्भावनापूर्ण तरीके से झूठा फंसाया गया है और पुलिस का पूरा मामला महज परिस्थितिजन्य साक्ष्यों (Circumstantial Evidence) पर टिका है, जिसके आधार पर उसे जेल में रखना अनुचित है।
सॉलिसिटर जनरल की आपत्ति
हनीमून के दौरान मेघालय में हुए इस सनसनीखेज हत्याकांड को लेकर मेघालय सरकार का पक्ष रख रहे देश के सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता ने अदालत में जोरदार पैरवी की। उन्होंने बेंच को बताया कि पूर्व में आरोपी को जो राहत मिली थी, वह महज एक दस्तावेजी त्रुटि के कारण थी, जिसमें केवल एक कानूनी धारा का नंबर टाइप करने में लिपिकीय गलती (Typographical Error) हुई थी। सॉलिसिटर जनरल ने तर्क दिया कि इतनी मामूली तकनीकी चूक को आधार बनाकर किसी जघन्य अपराध के आरोपी को जमानत का लाभ नहीं दिया जा सकता। इसके साथ ही उन्होंने कोर्ट को आगाह किया कि यदि सोनम की बेल बरकरार रहती है, तो उसके कानून की गिरफ्त से फरार होने की पूरी आशंका है।










