Rahul Gandhi in Parliament: लोकसभा की कार्यवाही के दौरान बुधवार को उस समय माहौल गरमा गया जब स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा शुरू हुई। विपक्ष के नेता राहुल गांधी और सत्ता पक्ष के सांसदों के बीच जमकर युद्ध देखने को मिला, जिससे सदन की कार्यवाही में काफी गतिरोध पैदा हुआ।
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विपक्ष के नेता का गंभीर आरोप
राहुल गांधी ने चर्चा के दौरान अपनी नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा कि भारतीय संसदीय लोकतंत्र के इतिहास में यह शायद पहला अवसर है जब विपक्ष के नेता (LoP) को अपना पक्ष रखने के उचित अवसर से वंचित किया जा रहा है। उन्होंने इस बात पर आपत्ति जताई कि सत्ता पक्ष के सांसद बार-बार उनका नाम लेकर उन पर निशाना साध रहे हैं, लेकिन जब वे जवाब देने के लिए खड़े होते हैं, तो उन्हें बोलने नहीं दिया जाता। गांधी ने स्पष्ट किया कि यह सदन किसी एक दल का नहीं बल्कि पूरे देश का है और यहाँ हर पक्ष की आवाज़ सुनी जानी चाहिए।
प्रधानमंत्री पर तीखा प्रहार
सरकार पर हमलावर होते हुए राहुल गांधी ने सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री ने अपने सिद्धांतों और देश के मुद्दों के साथ “समझौता” (कॉम्प्रोमाइज) कर लिया है। राहुल गांधी ने दावा किया कि जब भी उन्होंने इस ‘कॉम्प्रोमाइज’ के मुद्दे को उठाने की कोशिश की, तभी उनका माइक बंद कर दिया गया या उन्हें बोलने से रोक दिया गया। उनके अनुसार, यह लड़ाई केवल स्पीकर के पद को लेकर नहीं है, बल्कि यह देश के लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बचाने की लड़ाई है।
सत्ता पक्ष का कड़ा प्रतिवाद
राहुल गांधी के आरोपों का जवाब देते हुए वरिष्ठ बीजेपी सांसद रविशंकर प्रसाद ने मोर्चा संभाला। उन्होंने राहुल गांधी के ‘कॉम्प्रोमाइज’ वाले बयान को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि देश ने कभी समझौता स्वीकार नहीं किया है और न ही प्रधानमंत्री मोदी ने कभी किसी मुद्दे पर घुटने टेके हैं। रविशंकर प्रसाद ने गर्व के साथ कहा कि प्रधानमंत्री के नेतृत्व में सरकार अडिग रही है और राहुल गांधी के आरोप पूरी तरह आधारहीन और राजनीति से प्रेरित हैं।
“स्पीकर का पद राजनीतिक हथियार नहीं”
बहस को आगे बढ़ाते हुए रविशंकर प्रसाद ने यह भी याद दिलाया कि देश की आज़ादी के बाद यह केवल दूसरा अवसर है जब लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया है। उन्होंने विपक्ष की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा कि स्पीकर का पद अत्यंत गरिमामय और संवैधानिक होता है। इसे किसी राजनीतिक ‘टूल’ या हथियार की तरह इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि स्पीकर पूरे सदन के प्रति जवाबदेह होते हैं और उन पर इस तरह का प्रस्ताव लाना संसदीय परंपराओं के खिलाफ है।
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