MM Naravane Book: संसद में सोमवार को उस समय तीखी बहस देखने को मिली, जब कांग्रेस सांसद और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने पूर्व थलसेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे का उल्लेख करते हुए मोदी सरकार पर सीधा हमला बोला। राहुल गांधी ने एलएसी (वास्तविक नियंत्रण रेखा) पर चीनी टैंकों की मौजूदगी का जिक्र किया, जिसके बाद सदन में जोरदार हंगामा शुरू हो गया। बढ़ते शोर-शराबे के कारण लोकसभा की कार्यवाही को अंततः अगले दिन तक के लिए स्थगित कर दिया गया।
राहुल गांधी के बयान पर सरकार का विरोध
राहुल गांधी जिस मुद्दे को उठाने की कोशिश कर रहे थे, उसे लेकर सत्तापक्ष ने कड़ा विरोध जताया। सरकार की ओर से कहा गया कि जिस स्रोत का हवाला दिया जा रहा है, वह एक अप्रकाशित पुस्तक से जुड़ा है और इसे सदन में पढ़ना संसदीय नियमों के खिलाफ है। इसी आपत्ति के चलते बहस आगे नहीं बढ़ सकी और सदन बार-बार बाधित होता रहा।
शशि थरूर ने राहुल गांधी का किया समर्थन
इस पूरे घटनाक्रम पर कांग्रेस सांसद शशि थरूर की प्रतिक्रिया सामने आई है। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी को सदन में अपनी बात रखने का पूरा मौका दिया जाना चाहिए था। थरूर के अनुसार, सरकार की ओर से जरूरत से ज्यादा प्रतिक्रिया दी गई, जबकि राहुल गांधी जिस मुद्दे को उठाना चाहते थे, वह पहले से ही सार्वजनिक क्षेत्र में मौजूद था।
“आर्टिकल पब्लिक डोमेन में है”
शशि थरूर ने स्पष्ट किया कि राहुल गांधी ने जिस बात का उल्लेख किया, वह कारवां मैगजीन में प्रकाशित एक आर्टिकल पर आधारित थी। उस आर्टिकल में जनरल नरवणे के एक संस्मरण का जिक्र है, भले ही वह किताब अभी तक प्रकाशित न हुई हो। थरूर ने कहा कि जब मैगजीन सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है और कोई भी उसे पढ़ सकता है, तो सरकार को इस आधार पर आपत्ति नहीं करनी चाहिए थी।
सदन ठप होना दुर्भाग्यपूर्ण
थरूर ने यह भी कहा कि सरकार की इस तीखी प्रतिक्रिया के कारण संसद की कार्यवाही बेवजह बाधित हुई। उनके मुताबिक, संसद का उद्देश्य ही चर्चा करना है। यदि किसी मुद्दे पर तथ्य गलत हैं, तो उनका सबसे अच्छा जवाब तथ्यों को सही तरीके से सामने रखना होता है, न कि चर्चा को रोक देना।
“आरोप सेना पर नहीं, फैसलों पर हैं”
कांग्रेस सांसद ने यह स्पष्ट किया कि जिस आर्टिकल का हवाला दिया गया है, उसमें सेना या सैनिकों पर कोई आरोप नहीं लगाया गया है। यह मुद्दा पूरी तरह से केंद्र सरकार द्वारा लिए गए या न लिए गए फैसलों से जुड़ा है। शशि थरूर के अनुसार, राहुल गांधी भी सदन में यही सवाल उठाना चाहते थे, लेकिन उन्हें अपनी बात रखने का अवसर ही नहीं मिला।
नेहरू काल की संसदीय परंपराओं का जिक्र
शशि थरूर ने पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के समय की संसदीय परंपराओं का उल्लेख करते हुए कहा कि उस दौर में संसद में खुलकर बहस होती थी। उन्होंने 1962 के चीन युद्ध, 1965 और 1971 के युद्धों का उदाहरण देते हुए कहा कि उन कठिन समयों में भी संसद के सत्र चलते रहे और सरकार की आलोचना की पूरी स्वतंत्रता थी।
“चर्चा से डरती क्यों है सरकार?”
थरूर ने सवाल उठाया कि आज ऐसी स्थिति क्यों बन रही है, जहां सरकार चर्चा से डरती नजर आती है। उन्होंने कहा कि चीन जैसा गंभीर मुद्दा पूरे देश के लिए चिंता का विषय है और इस पर खुली बहस होनी चाहिए। विदेश मंत्री और रक्षा मंत्री को सदन में बोलने देना चाहिए, ताकि देश को सही जानकारी मिल सके।
लोकतंत्र और संसद के लिए खतरा
अंत में शशि थरूर ने कहा कि हर बात को छिपाने की प्रवृत्ति लोकतंत्र के लिए अच्छी नहीं है। उन्होंने जोर दिया कि पारदर्शिता और संवाद ही संसद की आत्मा हैं। यदि संसद में चर्चा नहीं होगी, तो यह न केवल लोकतंत्र बल्कि संसद की कार्यप्रणाली के लिए भी नुकसानदायक साबित होगा।










