लोक संस्कृति को बढ़ावा: राजस्थान की पढ़ाई में शामिल होंगे ‘लाडू-रोटलो’ जैसे देसी शब्द

जयपुर राजस्थान के सरकारी स्कूलों में अब पढ़ाई का अंदाज बदलने वाला है। स्थानीय भाषा को बढ़ावा देने के लिए सरकारी स्कूलों में अब लड्डू की जगह 'लाडू', रोटी की जगह 'रोटलो', बड़े पापा की जगह 'मोटो बापो' और रुपया की जगह 'पिया' जैसे स्थानीय शब्दों को शामिल कर छात्रों के लिए पढ़ाई को अधिक रोचक और सहज बनाया जाएगा। राजस्थान के सरकारी स्कूलों में अब पढ़ाई का अंदाज बदलने वाला है। स्थानीय भाषा को बढ़ावा देने के लिए सरकारी स्कूलों में अब लड्डू की जगह 'लाडू', रोटी की जगह 'रोटलो', बड़े पापा की जगह 'मोटो बापो' और रुपया की

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Published On :

मार्च 22, 2026

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जयपुर

राजस्थान के सरकारी स्कूलों में अब पढ़ाई का अंदाज बदलने वाला है। स्थानीय भाषा को बढ़ावा देने के लिए सरकारी स्कूलों में अब लड्डू की जगह 'लाडू', रोटी की जगह 'रोटलो', बड़े पापा की जगह 'मोटो बापो' और रुपया की जगह 'पिया' जैसे स्थानीय शब्दों को शामिल कर छात्रों के लिए पढ़ाई को अधिक रोचक और सहज बनाया जाएगा।

राजस्थान के सरकारी स्कूलों में अब पढ़ाई का अंदाज बदलने वाला है। स्थानीय भाषा को बढ़ावा देने के लिए सरकारी स्कूलों में अब लड्डू की जगह 'लाडू', रोटी की जगह 'रोटलो', बड़े पापा की जगह 'मोटो बापो' और रुपया की जगह 'पिया' जैसे स्थानीय शब्दों को शामिल कर छात्रों के लिए पढ़ाई को अधिक रोचक और सहज बनाया जाएगा।

राजस्थान राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (आरएससीईआरटी) की डायरेक्टर श्वेता फगेड़िया ने बताया कि शिक्षा विभाग ने राजस्थान में बहुभाषी शिक्षा परियोजना शुरू की है, जिसके तहत बच्चों को उनकी स्थानीय भाषा में पढ़ाया जाएगा।

चरणबद्ध रूप से पूरे प्रदेश में लागू की जाएगी परियोजना
श्वेता ने बताया कि इस परियोजना को फिलहाल राज्य के 11 जिलों में क्रियान्वित करने की योजना है और बाद में इसे चरणबद्ध रूप से पूरे प्रदेश में लागू किया जाएगा। उन्होंने बताया कि आरएससीईआरटी ने शिक्षा में भाषायी अंतर को समझने के लिए दो चरण में बोलियों का सर्वे कराया था। उन्होंने बताया कि पहले चरण में नौ जिलों प्रतापगढ़, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, चित्तौड़गढ़़, राजसमंद, पाली, सिरोही और उदयपुर में यह सर्वे किया गया। इसमें 20,298 प्राथमिक विद्यालयों के पहली कक्षा के 2,43,532 विद्यार्थियों के शिक्षकों को शामिल किया गया। सर्वे में इन जिलों में बोली जाने वाली 31 से अधिक बोलियों की पहचान की गई, जिसमें सामने आया कि वागड़ी और मेवाड़ी विद्यार्थियों द्वारा सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है।

दूसरे चरण में 24 जिलों में हुआ सर्वे
आरएससीईआरटी की डायरेक्टर ने बताया कि दूसरे चरण में 24 जिलों में एक व्यापक सर्वे किया गया। इस सर्वे के लिए डेटा इन जिलों में कक्षा एक को हिंदी भाषा पढ़ाने वाले शिक्षकों ने भरा। सर्वे में इन जिलों के 250 खंड में 41,686 विद्यालयों के कक्षा एक में पढ़ने वाले 3,66,782 विद्यार्थियों को शामिल किया गया। श्वेता ने बताया कि सर्वे का उद्देश्य विद्यालयों की सामाजिक भाषायी गतिशीलता को समझना और घर एवं विद्यालय के वातावरण के बीच भाषायी असमानताओं के कारण शिक्षा में पैदा होने वाली बाधाओं का आकलन करना था।

पहले 200 विद्यालयों में लागू किया गया
आरएससीईआरटी की डायरेक्टर ने बताया कि राज्य के भाषायी सर्वे के आधार पर प्रयोग के लिए डूंगरपुर और सिरोही का चयन किया गया क्योंकि इन जिलों में भाषायी विविधता सर्वाधिक तथा घरेलू भाषा और विद्यालय की भाषा के बीच अंतर अधिक है। अधिकारी ने बताया कि आरएससीईआरटी ने शुरुआत में बहुभाषी शिक्षा कार्यक्रम सिरोही जिले के आबूरोड ब्लॉक एवं डूंगरपुर जिले के बिछीवाड़ा ब्लॉक के 200 विद्यालयों में लागू किया और वहां पहले वर्ष कक्षा एक और दूसरे वर्ष कक्षा दो के विद्यार्थियों को स्थानीय भाषा में पढ़ाया गया। उन्होंने बताया कि सिरोही और डूंगरपुर के विद्यालयों में वागड़ी और गरासिया समुदाय की मातृभाषा के शब्दों का इस्तेमाल कर पढ़ाने से पढ़ाई में बच्चों की रुचि और समझ दोनों बढ़ी। श्वेता ने बताया कि वागड़ी बोली के 'पाणी', 'बापू', 'घरो', 'छोकरो', 'आवो' और 'रोटली' जैसे शब्दों तथा गरासिया बोली के आई (मां), बापो (पिता), मितर (दोस्त) जैसे शब्दों को शिक्षण में शामिल किया गया। उन्होंने कहा कि इससे बच्चों के लिए पढ़ाई अधिक सहज हो गई है।

स्कूलों बढ़ गई छात्रों की उपस्थिति
अधिकारी ने बताया कि इस कार्यक्रम के माध्यम से डूंगरपुर एवं सिरोही जिलों के विद्यालयों में बच्चों की उपस्थिति 58 प्रतिशत से बढ़कर 66 प्रतिशत हो गई तथा अक्षरों की पहचान कर सकने वाले बच्चों की संख्या छह प्रतिशत से बढ़कर 61 प्रतिशत हो गई। उन्होंने कहा, ''जो विद्यार्थी एक भी शब्द नहीं पढ़ पाते थे, उनकी संख्या 96 प्रतिशत से घटकर 12 प्रतिशत रह गई। जो विद्यार्थी एक भी शब्द नहीं लिख पाते थे, उनकी संख्या 97 प्रतिशत से घटकर 17 प्रतिशत रह गई और जो विद्यार्थी समझ-आधारित प्रश्रों के उत्तर नहीं दे पाते थे उनकी संख्या 32 प्रतिशत से घटकर 12 रह गई। इन परिणामों के बाद अब इन जिलों के समस्त विद्यालयों में वागड़ी और गरासिया भाषा के शब्दों को शामिल कर पढ़ाया जाएगा। इसके बाद राज्य के अन्य जिलों को वहां की स्थानीय भाषा के अनुसार इस कार्यक्रम से जोड़ा जाएगा।''

11 स्थानीय भाषाओं की सामग्री तैयार
शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने बताया कि इस सफलता के बाद अब राज्य में बोली जाने वाली 11 स्थानीय भाषाओं की सामग्री तैयार की गई है। इनमें कार्यपुस्तिका, कहानी पुस्तकें, चित्र चार्ट, कविता पोस्टर, स्थानीय भाषा के पहेलियां, खेल और बालगीत शामिल हैं। यह परियोजना संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनिसेफ), 'रूम टू रीड' और 'लैंग्वेज एंड लर्निंग फाउंडेशन' के सहयोग से संचालित की जा रही है।

 

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