Lucknow News: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में रविवार की सुबह राजनीतिक गहमागहमी के साथ शुरू हुई। ताजनगरी आगरा से आए एक युवा नेता, संजय चौधरी ने शहर के प्रमुख चौराहों और सार्वजनिक स्थानों पर पोस्टर लगाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘राष्ट्र पुत्र’ की उपाधि देने की पुरजोर मांग की है। यह पोस्टर देखते ही देखते सोशल मीडिया पर वायरल हो गए और राजधानी के गलियारों में चर्चा का विषय बन गए।
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प्रधानमंत्री को ‘राष्ट्र पुत्र’ सम्मान की मांग
बताते चले कि, लखनऊ के विभिन्न संवेदनशील और प्रमुख इलाकों में रातों-रात लगे इन पोस्टरों ने राहगीरों का ध्यान अपनी ओर खींचा। इन पोस्टरों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक भव्य तस्वीर के साथ उन्हें ‘राष्ट्र पुत्र’ की उपाधि से नवाजने की अपील की गई है। पोस्टर लगाने वाले युवा नेता संजय चौधरी का कहना है कि प्रधानमंत्री ने न केवल भारत में, बल्कि वैश्विक स्तर पर ‘सनातन धर्म’ का गौरव बढ़ाया है। उनके अनुसार, जिस तरह देश में ‘राष्ट्र पिता’ की उपाधि है, उसी तरह मोदी जी के कार्यों को देखते हुए उन्हें ‘राष्ट्र पुत्र’ घोषित किया जाना चाहिए।
आगरा के युवा नेता संजय चौधरी का वैचारिक रुख
मीडिया से मुखातिब होते हुए संजय चौधरी ने स्पष्ट किया कि वह अपनी इस मांग पर पूरी तरह अडिग हैं। उन्होंने कहा, “प्रधानमंत्री ने दुनिया भर में सनातन संस्कृति का परचम लहराया है और देश को एक नई पहचान दी है। मेरी यह मांग जनभावनाओं का प्रतिबिंब है।” पोस्टर में सबसे नीचे दाईं ओर संजय चौधरी की तस्वीर और उनका मोबाइल नंबर भी अंकित है। हालांकि, अभी तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि संजय चौधरी भारतीय जनता पार्टी में किस आधिकारिक पद पर हैं या आगरा संगठन में उनकी क्या भूमिका है, लेकिन उनके इस कदम ने व्यक्तिगत स्तर पर एक बड़ी बहस छेड़ दी है।
भाजपा की चुप्पी और राजनीतिक गलियारों में बढ़ती सरगर्मी
दिलचस्प बात यह है कि इस पूरे मामले पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की राज्य इकाई या किसी वरिष्ठ पदाधिकारी की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। सत्ताधारी दल ने फिलहाल इस पोस्टर विवाद से दूरी बना रखी है। दूसरी ओर, विपक्षी खेमे ने भी अभी तक इस पर कोई तीखी टिप्पणी नहीं की है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ‘राष्ट्र पुत्र’ जैसे शब्दों का प्रयोग आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नया मोड़ ले सकता है।
लखनऊ में पोस्टर वार और आगामी चर्चाओं का केंद्र
राजधानी में लगे ये पोस्टर अब न केवल आम जनता के बीच, बल्कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर भी बहस का मुद्दा बन चुके हैं। जहाँ एक वर्ग इसे प्रधानमंत्री के प्रति अगाध श्रद्धा के रूप में देख रहा है, वहीं दूसरा वर्ग इसे व्यक्तिगत प्रचार का जरिया मान रहा है। बिना किसी आधिकारिक राजनीतिक समर्थन के शुरू हुई यह मुहिम शासन और प्रशासन के लिए भी कौतूहल का विषय बनी हुई है। अब देखना यह होगा कि क्या यह मांग केवल पोस्टरों तक सीमित रहती है या इसे कोई बड़ा राजनीतिक स्वरूप मिलता है।










