West Asia Crisis : बुधवार शाम 7 बजे राजधानी दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आधिकारिक आवास पर ‘कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी’ (CCS) की एक अत्यंत महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। प्रधानमंत्री मोदी की अध्यक्षता में हुई इस बैठक का मुख्य एजेंडा पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में लगातार गहराते सैन्य संघर्ष और उसके कारण भारत पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों की समीक्षा करना था। वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए भारत सरकार अपनी रणनीतिक और आंतरिक सुरक्षा को लेकर पूरी तरह सतर्क नजर आ रही है। बैठक में युद्ध के कारण उत्पन्न होने वाली चुनौतियों और उनसे निपटने के लिए तैयार किए गए ‘एक्शन प्लान’ पर विस्तार से चर्चा की गई।
दिग्गज मंत्रियों और शीर्ष अधिकारियों की मौजूदगी
इस हाई-प्रोफाइल बैठक में केंद्र सरकार के लगभग सभी प्रमुख चेहरे शामिल हुए। बैठक में गृह मंत्री अमित शाह, विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण, पीयूष गोयल, शिवराज सिंह चौहान, जेपी नड्डा, अश्विनी वैष्णव, मनोहर लाल खट्टर, प्रल्हाद जोशी, किंजरापु राममोहन नायडू और हरदीप सिंह पुरी जैसे वरिष्ठ मंत्रियों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। इसके अलावा, देश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल, प्रधानमंत्री के प्रमुख सचिव पी.के. मिश्रा, आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास और कैबिनेट सचिव टी.वी. सोमनाथन ने भी हिस्सा लिया। इन विशेषज्ञों की मौजूदगी यह दर्शाती है कि सरकार न केवल सुरक्षा, बल्कि आर्थिक स्थिरता को लेकर भी गंभीर है।
आम जनता की बुनियादी जरूरतों पर विशेष ध्यान
CCS की इस बैठक का एक बड़ा हिस्सा आम नागरिकों की रोजमर्रा की जरूरतों को सुनिश्चित करने पर केंद्रित रहा। प्रधानमंत्री ने स्पष्ट निर्देश दिए कि पश्चिम एशिया के तनाव के कारण देश में खाद्य सामग्री, एलपीजी (LPG), पेट्रोल और डीजल की उपलब्धता में कोई कमी नहीं आनी चाहिए। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव और सप्लाई चेन में आने वाली बाधाओं के बावजूद, घरेलू बाजार में आवश्यक वस्तुओं की कीमतों को नियंत्रित रखने और स्टॉक बनाए रखने के उपायों पर मंथन किया गया। सरकार का लक्ष्य है कि वैश्विक संकट का बोझ भारतीय जनता की जेब पर कम से कम पड़े।
10 दिनों के भीतर दूसरी आपातकालीन बैठक
गौरतलब है कि पिछले 10 दिनों के भीतर CCS की यह दूसरी महत्वपूर्ण मीटिंग है। इससे पहले 23 मार्च को भी प्रधानमंत्री मोदी ने सुरक्षा समिति के साथ बैठक कर पश्चिम एशिया के संघर्ष के प्रभाव को कम करने के उपायों का आकलन किया था। प्रधानमंत्री ने पहले ही आगाह किया था कि यह समस्या लगातार जटिल होती जा रही है और इसका प्रभाव पूरी दुनिया पर पड़ना तय है। बार-बार होने वाली ये बैठकें इस बात का संकेत हैं कि भारत सरकार किसी भी आकस्मिक स्थिति से निपटने के लिए अपनी तैयारियों को अंतिम रूप दे रही है और पल-पल की बदलती परिस्थितियों पर पैनी नजर रख रही है।
विभिन्न मंत्रालयों के बीच समन्वय और भविष्य की रणनीति
बैठक के दौरान कैबिनेट सचिव ने अब तक उठाए गए कदमों और भविष्य के प्रस्तावित उपायों की विस्तृत जानकारी दी। चर्चा केवल सैन्य सुरक्षा तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसमें कृषि, उर्वरक, खाद्य सुरक्षा, पेट्रोलियम, बिजली, एमएसएमई (MSMEs), निर्यात, शिपिंग और व्यापार जैसे विभिन्न क्षेत्रों पर पड़ने वाले संभावित असर का भी विश्लेषण किया गया। प्रधानमंत्री ने सभी संबंधित विभागों को मिलकर काम करने का निर्देश दिया है ताकि सप्लाई चेन बाधित न हो। विशेष रूप से निर्यातकों और शिपिंग उद्योग को सुरक्षित गलियारा प्रदान करने और वित्त क्षेत्र में तरलता बनाए रखने पर भी सहमति बनी है।
वैश्विक अशांति के बीच भारत की मजबूत तैयारी
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को हिलाकर रख दिया है। ऐसे में भारत ने अपनी ‘प्री-एम्पटिव’ (पूर्व-नियोजित) रणनीति के जरिए यह संदेश दिया है कि वह अपनी ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। प्रधानमंत्री मोदी की अध्यक्षता में हुई इस बैठक ने यह साफ कर दिया है कि सरकार न केवल अपनी सीमाओं और नागरिकों की रक्षा के लिए तैयार है, बल्कि वैश्विक संकट के समय अपनी अर्थव्यवस्था को ‘शॉकप्रूफ’ बनाने के लिए हर संभव कूटनीतिक और प्रशासनिक कदम उठा रही है। आने वाले दिनों में इन चर्चाओं के आधार पर कुछ और महत्वपूर्ण नीतिगत निर्णय लिए जा सकते हैं।
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