Teejan Bai Death: छत्तीसगढ़ की लोकगायिका तीजन बाई का 70 वर्ष की उम्र में निधन, कला जगत में गहरे शोक की लहर

अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त पंडवानी गायिका पद्म विभूषण तीजन बाई का रविवार तड़के रायपुर के एम्स अस्पताल में निधन हो गया। वे लंबे समय से अस्वस्थ थीं। दुर्ग जिले की रहने वाली तीजन बाई ने सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ते हुए पंडवानी की 'कापालिक शैली' को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाई और कला जगत में एक युग का अंत कर गईं।

Teejan Bai Death

Wrriten By :

Aanchal Singh

Published On :

जुलाई 5, 2026

Teejan Bai Death: छत्तीसगढ़ की माटी की सुपुत्र और लोक संस्कृति को वैश्विक स्तर पर एक अमिट पहचान दिलाने वाली अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त पंडवानी गायिका पद्म विभूषण तीजन बाई का रविवार सुबह 3:15 बजे रायपुर स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) में इलाज के दौरान निधन हो गया। वह पिछले लंबे समय से गंभीर बीमारियों और उम्र संबंधी अस्वस्थता से जूझ रही थीं, जिसके चलते अस्पताल में उनका सतत उपचार चल रहा था। तीजन बाई के आकस्मिक अवसान की खबर मिलते ही छत्तीसगढ़ समेत संपूर्ण देश के कला, संस्कृति और संगीत जगत में गहरे शोक की लहर दौड़ गई है।

दुर्ग की बेटी का अद्भुत सफर

बताते चले कि, मूल रूप से दुर्ग जिले की निवासी रहीं डॉ. तीजन बाई ने अपनी विलक्षण गायन शैली, बुलंद आवाज, दमदार मंचीय प्रस्तुति और सशक्त आंगिक अभिनय के बल पर ‘पंडवानी लोक विधा’ को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक गरिमापूर्ण पहचान दिलाई। उन्होंने महाभारत की पौराणिक कथाओं, विशेषकर भीम के चरित्र को अपने हाथ में थामे तंबूरे के माध्यम से इस तरह जीवंत किया कि देश-विदेश के लाखों दर्शक उनकी कला के मुरीद हो गए। उनकी प्रस्तुतियों में जो वीरता और रौद्र रस झलकता था, वह दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देता था।

सामाजिक रूढ़ियों को दी चुनौती

तीजन बाई का जन्म 24 अप्रैल 1956 को दुर्ग जिले के गनियारी गांव में एक बेहद साधारण पारधी परिवार में हुआ था। बचपन से ही उन्हें अपने नाना से महाभारत की कथाएं सुनने और उन्हें गाने का गहरा शौक था। उस दौर में महिलाओं के लिए पंडवानी की ‘कापालिक शैली’ (जिसमें खड़े होकर और अभिनय करते हुए गाया जाता है) में प्रस्तुति देना सामाजिक रूप से वर्जित माना जाता था। तीव्र सामाजिक विरोध, पारिवारिक बहिष्कार और अत्यधिक आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने अपने इस सांस्कृतिक जुनून को नहीं छोड़ा। तीजन बाई ने मात्र 13 वर्ष की अल्पायु में दुर्ग के चंद्रखुरी गांव में अपनी पहली सार्वजनिक मंचीय प्रस्तुति देकर रूढ़ियों को तोड़ दिया था।

छत्तीसगढ़ी लोककला का वैश्विक डंका

तीजन बाई ने केवल भारत के भीतर ही नहीं, बल्कि सात समंदर पार भी छत्तीसगढ़ की लोककला और लोक संस्कृति का परचम लहराया। उन्होंने अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जापान, रूस, ऑस्ट्रेलिया और जर्मनी समेत दर्जनों देशों के सांस्कृतिक मंचों पर पंडवानी की ऐतिहासिक प्रस्तुतियां दीं। विदेशी धरती पर उनकी अनूठी गायन कला और शैली की अत्यधिक सराहना हुई। वे विदेशों में भारत और विशेषकर छत्तीसगढ़ की एक सांस्कृतिक राजदूत की तरह जानी जाती थीं।

पद्मश्री से लेकर पद्म विभूषण तक, पुरस्कारों से सुशोभित हुआ जीवन

कला और संस्कृति के क्षेत्र में उनके इस अतुलनीय और ऐतिहासिक योगदान के लिए भारत सरकार तथा विभिन्न प्रतिष्ठित संस्थाओं द्वारा उन्हें समय-समय पर देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों से नवाजा गया। उनके पुरस्कारों की श्रृंखला इस प्रकार है:

  • पद्मश्री (1988): कला क्षेत्र में शुरुआती राष्ट्रीय पहचान।
  • संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1995): कला जगत का सर्वोच्च अकादमिक सम्मान।
  • पद्मभूषण (2003): देश का तीसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान।
  • पद्म विभूषण (2019): कला और संस्कृति में असाधारण योगदान के लिए देश का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान।

छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक थीं डॉ. तीजन बाई

तीजन बाई केवल एक पारंपरिक लोकगायिका नहीं थीं, बल्कि वे छत्तीसगढ़ राज्य की मूल सांस्कृतिक अस्मिता और नारी सशक्तिकरण का जीवंत प्रतीक थीं। उन्होंने अपने जीवन के लगभग छह दशक (60 वर्ष) पूरी तरह से लोककला की साधना और पंडवानी के संरक्षण में समर्पित कर दिए। उनके निधन से एक स्वर्णिम युग का अंत हो गया है, लेकिन उनके द्वारा तैयार की गई नई पीढ़ी और उनकी अनूठी विरासत हमेशा पंडवानी की समृद्ध परंपरा को जीवित रखेगी।