Gyanesh Kumar CEC : मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर गहराया संकट, विपक्षी सांसदों ने हटाने के लिए सौंपा नया प्रस्ताव

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग ने तूल पकड़ लिया है। विपक्षी दलों ने राज्यसभा में एक ताज़ा प्रस्ताव पेश किया है, जिसमें चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाए गए हैं। 73 सांसदों के हस्ताक्षर वाले इस नोटिस में आयोग पर पक्षपातपूर्ण व्यवहार का आरोप लगाया गया है। क्या यह प्रस्ताव स्वीकार होगा?

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

अप्रैल 24, 2026

Gyanesh Kumar CEC : नई दिल्ली में राजनीतिक सरगर्मी एक बार फिर तेज हो गई है। विपक्षी दलों ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को उनके पद से हटाने के लिए एक बार फिर मोर्चा खोल दिया है। शुक्रवार को राज्यसभा के करीब 73 सांसदों ने उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति सी.पी. राधाकृष्णन को एक नया औपचारिक नोटिस सौंपा है। यह कदम तमिलनाडु विधानसभा चुनाव और पश्चिम बंगाल के प्रथम चरण के मतदान के तुरंत बाद उठाया गया है। विपक्षी सांसदों का तर्क है कि यह नया नोटिस हाल ही में सामने आए विशिष्ट आधारों और साक्ष्यों पर आधारित है, जो चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं।

जांच के लिए न्यायिक कमेटी की मांग: सिद्ध दुराचार का लगाया आरोप

सभापति को भेजे गए पत्र में सांसदों ने स्पष्ट किया है कि यह शिकायत 15 मार्च 2026 के बाद ज्ञानेश कुमार द्वारा किए गए कार्यों और निर्णयों तक सीमित है। विपक्ष का आरोप है कि इस अवधि के दौरान उनके द्वारा की गई चूक और लिए गए फैसले ‘गंभीर स्तर के सिद्ध दुराचार’ की श्रेणी में आते हैं। सांसदों ने मांग की है कि इस मामले की निष्पक्ष जांच के लिए तीन सदस्यीय उच्च स्तरीय कमेटी का गठन किया जाए। इस प्रस्तावित कमेटी में सुप्रीम कोर्ट के एक मौजूदा न्यायाधीश, किसी हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और एक अन्य न्यायिक विशेषज्ञ को शामिल करने की बात कही गई है। विपक्ष चाहता है कि जब तक जांच लंबित रहे, तब तक ज्ञानेश कुमार चुनावी जिम्मेदारियों से दूर रहें।

पहले खारिज हो चुके हैं प्रस्ताव: सबूतों की कमी बनी थी बाधा

यह पहली बार नहीं है जब ज्ञानेश कुमार विपक्ष के निशाने पर आए हैं। इससे पहले 12 मार्च को भी 63 राज्यसभा और 130 लोकसभा सांसदों ने उन्हें हटाने का प्रस्ताव दिया था। हालांकि, 6 अप्रैल को राज्यसभा सभापति और लोकसभा अध्यक्ष ने प्रारंभिक सबूतों की कमी का हवाला देते हुए इन प्रस्तावों को खारिज कर दिया था। लेकिन इस बार विपक्ष का दावा है कि उनके पास हालिया चुनाव प्रचार के दौरान हुए पक्षपात के पुख्ता प्रमाण हैं, जो पिछले खारिज किए गए नोटिसों से बिल्कुल अलग और अधिक प्रभावी हैं।

आचार संहिता और पक्षपात के आरोप: पीएम मोदी के भाषण का हवाला

नए प्रस्ताव में सबसे बड़ा आरोप आचार संहिता (MCC) के कार्यान्वयन में ‘दोहरे मानदंड’ अपनाने का है। सांसदों ने 18 मार्च को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दिए गए 29 मिनट के भाषण का विशेष उल्लेख किया है। आरोप है कि सरकारी चैनलों (दूरदर्शन, संसद टीवी और आकाशवाणी) पर लाइव प्रसारित यह भाषण कोयंबटूर की चुनावी रैली के समान था। पत्र के अनुसार, प्रधानमंत्री ने कांग्रेस, डीमके, टीएमसी और समाजवादी पार्टी का नाम लेकर तीखी आलोचना की और उन पर संवैधानिक संशोधन विधेयक के मामले में ‘भ्रूण हत्या’ जैसा अपराध करने का आरोप लगाया। विपक्ष का कहना है कि चुनाव आयुक्त ने इस तरह के भाषणों पर मौन रहकर अपनी तटस्थता खो दी है।

शिकायतों पर चुप्पी और दोहरा मानदंड: विपक्ष का गंभीर प्रहार

विपक्षी सांसदों ने आरोप लगाया है कि जब राज्यसभा सांसद मनोज झा और अन्य नेताओं ने 19 अप्रैल को मुख्य चुनाव आयुक्त से लिखित शिकायत की, तो उस पर कोई संज्ञान नहीं लिया गया। वहीं, 20 अप्रैल को 700 नागरिकों द्वारा सौंपे गए ज्ञापन पर भी आयोग ने कोई कारण बताओ नोटिस जारी नहीं किया। इसके विपरीत, पत्र में यह आरोप लगाया गया है कि भाजपा द्वारा विपक्षी नेताओं, विशेषकर कांग्रेस के खिलाफ की गई शिकायतों पर ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व वाले आयोग ने बिजली की गति से कार्रवाई की। विपक्ष का मानना है कि यह व्यवहार लोकतंत्र के लिए घातक है और चुनाव आयोग की गरिमा को ठेस पहुँचाता है। अब सबकी निगाहें सभापति के अगले कदम पर टिकी हैं।

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