Iran US War News: ईरान पर ‘डेकेपिटेशन स्ट्राइक’! नेतन्याहू के एक फोन से शुरू हुआ खामेनेई का अंत?

अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' में एक बड़ा खुलासा हुआ है। रिपोर्ट्स के अनुसार, हमले से 48 घंटे पहले पीएम नेतन्याहू ने राष्ट्रपति ट्रंप को 'डेकेपिटेशन स्ट्राइक' के लिए राजी किया। 28 फरवरी को हुए इस हमले का मुख्य उद्देश्य ईरान की मिसाइल क्षमता और परमाणु केंद्रों को पूरी तरह ध्वस्त करना था।

Wrriten By :

Aanchal Singh

Published On :

मार्च 24, 2026

Iran US War News: अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच एक सनसनीखेज खुलासा हुआ है। हालिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान पर किए गए अमेरिकी हमले की पटकथा किसी अचानक हुई घटना का परिणाम नहीं थी, बल्कि इसके पीछे इजरायल और अमेरिका के बीच एक बेहद रणनीतिक और गुप्त संवाद था। इस पूरे सैन्य अभियान में ’20 मिनट की एक कॉल’ ने निर्णायक भूमिका निभाई।

नेतन्याहू की गुप्त कॉल और ‘डेकेपिटेशन स्ट्राइक’ का प्रस्ताव

एक विशेष रिपोर्ट के अनुसार, ईरान पर अमेरिकी हमले से ठीक 48 घंटे पहले इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को फोन किया था। इस बातचीत के दौरान नेतन्याहू ने बेहद आक्रामक रुख अपनाते हुए कहा कि अब वह सही समय आ गया है जब ईरान की शीर्ष नेतृत्व टीम पर निर्णायक प्रहार किया जाए।

नेतन्याहू ने नई खुफिया जानकारियों का हवाला देते हुए राष्ट्रपति ट्रंप को यह समझाया कि ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनेई और उनके सबसे करीबी सहयोगियों को निशाना बनाना क्यों जरूरी है। उन्होंने इस हमले को एक “डेकेपिटेशन स्ट्राइक” (शीर्ष नेतृत्व को खत्म करने वाला हमला) करार दिया। नेतन्याहू का तर्क था कि इतिहास में शायद दोबारा कभी खामेनेई को हटाने का ऐसा सटीक मौका नहीं मिलेगा। उन्होंने इस कदम को रणनीतिक जीत के साथ-साथ एक बड़े प्रतीकात्मक प्रहार के रूप में पेश किया।

व्हाइट हाउस की युद्ध रणनीति

हालांकि, ट्रंप प्रशासन पहले से ही ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई के विकल्प पर विचार कर रहा था, लेकिन हमले का सटीक समय और उसका पैमाना (Scale) अभी तय नहीं था। रिपोर्ट बताती है कि नेतन्याहू की इस कॉल ने उस अनिश्चितता को खत्म कर दिया। राष्ट्रपति ट्रंप पहले से ही सैन्य विकल्प के पक्ष में थे, लेकिन इजरायली प्रधानमंत्री के अंतिम तर्कों और नई इंटेलिजेंस रिपोर्ट ने उन्हें ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ (Operation Epic Fury) को हरी झंडी देने के लिए प्रेरित किया।

विशेषज्ञों का मानना है कि नेतन्याहू के दबाव और जमीनी हकीकत के सटीक विश्लेषण ने व्हाइट हाउस को यह विश्वास दिलाया कि यही वह क्षण है जब ईरान की सैन्य शक्ति को अपंग किया जा सकता है। इसी कॉल के बाद हमले की अंतिम रणनीति को अंतिम रूप दिया गया।

28 फरवरी का सैन्य अभियान और परमाणु क्षमताओं पर प्रहार

इस कूटनीतिक हलचल का परिणाम 28 फरवरी को देखने को मिला, जब अमेरिका ने ईरान पर अपना पहला बड़ा हमला किया। इस ऑपरेशन के सफल होने के बाद राष्ट्रपति ट्रंप ने आधिकारिक घोषणा की कि आयतुल्लाह खामेनेई मारे गए हैं। व्हाइट हाउस द्वारा जारी बयान में स्पष्ट किया गया कि इस पूरे सैन्य अभियान का मुख्य उद्देश्य ईरान की बैलिस्टिक मिसाइल प्रणाली और उसके उत्पादन केंद्रों को पूरी तरह ध्वस्त करना था। अमेरिका का लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि ईरान भविष्य में कभी भी परमाणु हथियार विकसित करने की स्थिति में न रहे।

इजरायली प्रधानमंत्री का स्पष्टीकरण और कूटनीतिक बचाव

हैरानी की बात यह है कि जहां एक तरफ रिपोर्ट्स इस हमले के पीछे इजरायली दबाव की बात कर रही हैं, वहीं नेतन्याहू ने सार्वजनिक रूप से इन दावों को खारिज किया है। उन्होंने मीडिया में चल रही इन खबरों को “फेक न्यूज” बताया कि इजरायल ने अमेरिका को युद्ध के लिए उकसाया या मजबूर किया। नेतन्याहू ने कड़े शब्दों में कहा, “कोई भी डोनाल्ड ट्रंप को यह नहीं बताता कि उन्हें क्या करना है।” खुद राष्ट्रपति ट्रंप ने भी इस बात की पुष्टि की कि ईरान पर हमला करने का अंतिम फैसला पूरी तरह से उनका अपना था और यह अमेरिकी हितों को ध्यान में रखकर लिया गया था।