
OBC Creamy Layer: अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आरक्षण के तहत ‘क्रीमी लेयर’ (Creamy Layer) के निर्धारण को लेकर लंबे समय से चला आ रहा विवाद अब समाप्त हो गया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में केंद्र सरकार द्वारा दाखिल पुनर्विचार याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया है।
शीर्ष अदालत ने अपने रुख को बिल्कुल स्पष्ट करते हुए कहा है कि क्रीमी लेयर की परिभाषा पर 11 मार्च 2026 को दिया गया उसका ऐतिहासिक फैसला ही अंतिम और प्रभावी रहेगा। अदालत ने साफ तौर पर दोहराया कि माता-पिता के वेतन (Salary) और कृषि से होने वाली आय (Agricultural Income) को क्रीमी लेयर तय करने का पैमाना नहीं बनाया जा सकता।
वंचित पात्र सिविल सेवा अभ्यर्थियों को तुरंत नियुक्ति देने का निर्देश

इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) को एक बड़ा दिशा-निर्देश जारी किया है। अदालत ने आदेश दिया कि सिविल सेवा परीक्षा (UPSC Civil Services) पास करने वाले उन सभी ओबीसी उम्मीदवारों को अविलंब नियुक्ति प्रदान की जाए, जिन्हें DoPT द्वारा गलत तरीके से क्रीमी लेयर के दायरे में मानकर नौकरी से वंचित कर दिया गया था।
इस निर्णय से प्रशासनिक सेवा (IAS), पुलिस सेवा (IPS) और राजस्व सेवा (IRS) समेत अन्य केंद्रीय सेवाओं के लिए चयनित उन योग्य अभ्यर्थियों के लिए दरवाजे खुल गए हैं, जो वर्षों से अपने हक की लड़ाई लड़ रहे थे।
क्या था सुप्रीम कोर्ट का 11 मार्च का फैसला?
11 मार्च 2026 को सुनाए गए अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी थी कि किसी भी अभ्यर्थी को केवल माता-पिता की वेतनभोगी आय के आधार पर क्रीमी लेयर में डालकर आरक्षण के लाभ से बाहर नहीं किया जा सकता।
अदालत ने स्पष्ट किया था कि क्रीमी लेयर का निर्धारण केवल मौद्रिक आय से नहीं, बल्कि माता-पिता के सामाजिक स्तर और उनके पद की प्रकृति (Rank/Post) के आधार पर होना चाहिए। सरकारी नियमों की सही व्याख्या के अनुसार, वेतन और कृषि से प्राप्त आय को क्रीमी लेयर की गणना के लिए निर्धारित आय सीमा में नहीं जोड़ा जाना चाहिए।
दशक पुराने विवाद का अंत, ओबीसी अभ्यर्थियों की बड़ी जीत
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का अभ्यर्थियों और विधिक विशेषज्ञों ने जोरदार स्वागत किया है। मामले में याचिकाकर्ताओं के वकील शशांक रत्नू ने इसे ओबीसी वर्ग के अधिकारों की एक ऐतिहासिक जीत करार दिया।
उन्होंने कहा कि इस फैसले ने पिछले लगभग एक दशक से चले आ रहे अन्याय और अनिश्चितता के माहौल को समाप्त कर दिया है। इससे उन सैकड़ों मेधावी अभ्यर्थियों को उनका न्यायसंगत अधिकार और सम्मान मिलेगा, जो सिविल सेवा परीक्षा में सफलता प्राप्त करने के बावजूद प्रशासनिक भूलों और गलत व्याख्याओं के कारण नियुक्तियों से वंचित रह गए थे।











