Obama on Trump: अमेरिका के राजनीतिक गलियारों में जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण नियमों को लेकर एक बार फिर टकराव की स्थिति पैदा हो गई है। हाल ही में पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के उस विवादास्पद फैसले पर गहरी चिंता व्यक्त की है, जिसमें ट्रंप ने जलवायु नियमों के आधारभूत वैज्ञानिक निष्कर्ष को रद्द कर दिया है। ओबामा का मानना है कि इस कदम से न केवल पर्यावरण को नुकसान होगा, बल्कि आम अमेरिकियों का स्वास्थ्य और सुरक्षा भी दांव पर लग जाएगी।
वैज्ञानिक निष्कर्ष ‘एंडेंजरमेंट फाइंडिंग’ को रद्द करने का प्रभाव
बराक ओबामा के कार्यकाल के दौरान एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक रिपोर्ट तैयार की गई थी, जिसे ‘एंडेंजरमेंट फाइंडिंग’ के नाम से जाना जाता है। यह रिपोर्ट स्पष्ट रूप से बताती थी कि ग्रीनहाउस गैसें (जैसे कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन) मानव स्वास्थ्य और जीवन के लिए एक गंभीर खतरा हैं। इन्हीं गैसों के कारण वैश्विक तापमान में वृद्धि हो रही है, जो जलवायु परिवर्तन का मुख्य कारण है। ओबामा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि इस वैज्ञानिक आधार को हटाना खतरनाक है। उन्होंने आरोप लगाया कि यह सब केवल तेल और गैस कंपनियों के मुनाफे को बढ़ाने के लिए किया जा रहा है, जिससे भविष्य में जलवायु परिवर्तन से लड़ना और भी चुनौतीपूर्ण हो जाएगा।
ट्रंप की घोषणा और प्रमुख अधिकारियों की भूमिका
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस बड़े नीतिगत बदलाव की घोषणा ईपीए (EPA) के एडमिनिस्ट्रेटर ली ज़ेल्डिन और व्हाइट हाउस के बजट डायरेक्टर रसेल वोउट की मौजूदगी में की। रसेल वोउट, जो ‘प्रोजेक्ट 2025’ के मुख्य रणनीतिकार भी हैं, लंबे समय से इस वैज्ञानिक निष्कर्ष को खत्म करने की पैरवी कर रहे थे। इस फैसले के लागू होने के बाद, अब वाहनों के लिए ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन मानकों को मापने, रिपोर्ट करने और प्रमाणित करने के कड़े फेडरल नियम स्वतः ही समाप्त हो जाएंगे। हालांकि, शुरुआती चरण में यह बदलाव बिजली संयंत्रों (Power Plants) जैसे स्थिर स्रोतों पर लागू नहीं होगा, लेकिन ऑटोमोबाइल सेक्टर के लिए यह एक बड़ी छूट है।
ट्रंप प्रशासन का तर्क: क्यों उठाया गया यह कदम?
डोनाल्ड ट्रंप ने अपने इस फैसले को अमेरिका के इतिहास की “सबसे बड़ी डिरेगुलेटरी कार्रवाई” करार दिया है। उनका तर्क है कि ओबामा युग की ये नीतियां अमेरिकी ऑटो इंडस्ट्री पर बोझ थीं, जिससे उत्पादन लागत बढ़ रही थी और अंततः उपभोक्ताओं को गाड़ियों के लिए अधिक कीमत चुकानी पड़ रही थी। ट्रंप प्रशासन का मानना है कि पर्यावरण के नाम पर लगाए गए ये प्रतिबंध फॉसिल फ्यूल (जीवाश्म ईंधन) के विकास में बाधा बन रहे थे। ट्रंप ने स्पष्ट किया कि ‘एंडेंजरमेंट फाइंडिंग’ को समाप्त करना अमेरिकी अर्थव्यवस्था को फिर से रफ्तार देने और उद्योगों को अनावश्यक कानूनी पेचीदगियों से मुक्त करने की दिशा में एक बड़ा कदम है।
इतिहास और कानूनी आधार: 2009 से अब तक का सफर
‘एंडेंजरमेंट फाइंडिंग’ का इतिहास काफी महत्वपूर्ण है। इसे पहली बार 2009 में अपनाया गया था, जो 2007 के ‘मैसाचुसेट्स बनाम ईपीए’ मामले में सुप्रीम कोर्ट के एक ऐतिहासिक फैसले पर आधारित था। सुप्रीम कोर्ट ने तब व्यवस्था दी थी कि ईपीए के पास ‘क्लीन एयर एक्ट 1963’ के तहत कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य हानिकारक गैसों को नियंत्रित करने का पूरा अधिकार है। इसी आधार पर पिछले एक दशक से कारों, पावर प्लांट्स और अन्य उद्योगों से होने वाले प्रदूषण को कम करने के लिए कड़े मानक तय किए गए थे। अब इन मानकों के हटने से पर्यावरणविदों के बीच यह डर पैदा हो गया है कि अमेरिका में प्रदूषण का स्तर एक बार फिर तेजी से बढ़ सकता है।
भविष्य की चुनौतियां और पर्यावरण पर असर
विशेषज्ञों का मानना है कि क्लीन एनर्जी (स्वच्छ ऊर्जा) के रोलआउट को धीमा करने और फॉसिल फ्यूल को बढ़ावा देने वाले ये कदम वैश्विक स्तर पर जलवायु लक्ष्यों को प्रभावित कर सकते हैं। जहाँ ओबामा इसे जन-स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ मान रहे हैं, वहीं ट्रंप इसे आर्थिक स्वतंत्रता के रूप में देख रहे हैं। यह बहस आने वाले समय में और भी तीव्र होने की उम्मीद है, क्योंकि इसका सीधा असर न केवल अमेरिका की अर्थव्यवस्था पर, बल्कि पूरी दुनिया के पर्यावरण पर पड़ना तय है।









