ना फूल–ना बेलपत्र, यहां बैगन से होती है पूजा—बिहार के अनूठे शिवधाम की खास परंपरा

वैशाली वैशाली जिले के जंदाहा प्रखंड क्षेत्र अंतर्गत वसंतपुर धधुआ स्थित बाबा बटेश्वरनाथ धाम देश का एकमात्र ऐसा मंदिर माना जाता है, जहां वटवृक्ष के कंदरा से प्रकट काले रंग का शिवलिंग विराजमान है। यह प्राचीन और आस्था का केंद्र मंदिर दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालुओं की भारी भीड़ के लिए जाना जाता है, जहां बड़ी संख्या में भक्त पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं। बैगन चढ़ाने की अनोखी परंपरा बाबा बटेश्वरनाथ धाम के गर्भगृह में स्थापित भगवान भोलेनाथ के शिवलिंग पर श्रद्धालु प्रसाद के रूप में बैगन (सब्जी) अर्पित करते हैं। क्षेत्र के किसान अपने खेतों में सब्जी की खेती

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Published On :

जनवरी 26, 2026

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वैशाली

वैशाली जिले के जंदाहा प्रखंड क्षेत्र अंतर्गत वसंतपुर धधुआ स्थित बाबा बटेश्वरनाथ धाम देश का एकमात्र ऐसा मंदिर माना जाता है, जहां वटवृक्ष के कंदरा से प्रकट काले रंग का शिवलिंग विराजमान है। यह प्राचीन और आस्था का केंद्र मंदिर दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालुओं की भारी भीड़ के लिए जाना जाता है, जहां बड़ी संख्या में भक्त पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं।

बैगन चढ़ाने की अनोखी परंपरा

बाबा बटेश्वरनाथ धाम के गर्भगृह में स्थापित भगवान भोलेनाथ के शिवलिंग पर श्रद्धालु प्रसाद के रूप में बैगन (सब्जी) अर्पित करते हैं। क्षेत्र के किसान अपने खेतों में सब्जी की खेती करने के बाद पहली उपज के रूप में बैगन भगवान भोलेनाथ को चढ़ाते हैं। मान्यता है कि सच्चे मन से मांगी गई मन्नतें यहां अवश्य पूरी होती हैं और मन्नत पूरी होने पर श्रद्धालु बैगन चढ़ाने जरूर आते हैं।

मंदिर के उपाध्यक्ष अनिल कुमार सिंह ने बताया कि यह एक अत्यंत प्राचीन मंदिर है, जिसकी स्थापना का कोई लिखित इतिहास उपलब्ध नहीं है। मान्यता है कि शिवलिंग स्वयं वटवृक्ष के कंदरा से प्रकट हुआ है। मंदिर परिसर में भगवान नंदी महाराज की प्रतिमा भी स्थापित है और यहां शिवलिंग के साथ-साथ नंदी महाराज की भी विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है।

राजा जनक से जुड़ी ऐतिहासिक मान्यता

अनिल कुमार सिंह ने बताया कि एक मान्यता के अनुसार, राजा जनक जब जनकपुर से चंपा घाट स्नान के लिए आते थे, तो उनका हाथी, जिस पर पुष्पक विमान सजा होता था, बाबा बटेश्वरनाथ धाम में रुकता था। राजा जनक यहां भगवान भोलेनाथ की पूजा-अर्चना करने के बाद ही जनकपुर की ओर प्रस्थान करते थे। उन्होंने बताया कि यह क्षेत्र कृषि प्रधान है। जब किसानों की सब्जी की फसल तैयार होती है, तो वे सब्जियों में से बैगन को प्रसाद और चढ़ावे के रूप में बाबा बटेश्वरनाथ को अर्पित करते हैं। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि यहां मांगी गई हर मन्नत पूरी होती है।

मंदिर में पूजा-अर्चना के लिए बिहार के वैशाली, छपरा, मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर, पटना समेत कई जिलों से श्रद्धालु पहुंचते हैं। इसके अलावा असम के सिलचर, साथ ही नेपाल और रूस जैसे देशों से भी भक्त यहां आकर आशीर्वाद प्राप्त कर चुके हैं। अनिल कुमार सिंह ने बताया कि रूस से आए एक शिवभक्त ने रूस की मुद्रा चढ़ावे के रूप में अर्पित की थी, जिसे मंदिर संग्रहालय में सुरक्षित रखा गया है। मंदिर प्रशासन का दावा है कि पूरे विश्व में इस आकार और स्वरूप का काले रंग का शिवलिंग कहीं और नहीं है, जो वटवृक्ष के कंदरा से प्राकृतिक रूप से प्रकट हुआ हो। यही कारण है कि बाबा बटेश्वरनाथ धाम की पहचान देश-विदेश तक फैली हुई है।

महाशिवरात्रि और बसंत पंचमी पर भव्य मेला

उन्होंने बताया कि महाशिवरात्रि और बसंत पंचमी के अवसर पर मंदिर परिसर में भव्य मेला लगता है। महाशिवरात्रि पर एक माह तक मेला आयोजित होता है, जिसमें सैकड़ों क्विंटल बैगन भगवान को चढ़ाया जाता है। वहीं, बसंत पंचमी पर एक दिन का मेला लगता है, जिसमें भी बैगन चढ़ाया जाता है, हालांकि मात्रा अपेक्षाकृत कम होती है। मेले में तेजपत्ता और लकड़ी से बने सामानों की खूब बिक्री होती है। इसके अलावा सावन माह में भी पूजा-अर्चना और जलाभिषेक को लेकर शिवभक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। पूरा मंदिर परिसर और आसपास का वातावरण भक्ति और श्रद्धा से सराबोर नजर आता है।

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