Nishikant Dubey On Rahul Gandhi: निशिकांत दुबे का राहुल गांधी पर हमला, स्पीकर और संविधान को लेकर छिड़ी सियासी रार

संसद की कार्यवाही के दौरान बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने राहुल गांधी पर पलटवार करते हुए उन्हें 'संविधान का विरोधी' करार दिया है। स्पीकर के पद को लेकर राहुल की टिप्पणियों पर दुबे ने जो तर्क दिए, उसने विपक्षी खेमे में खलबली मचा दी है। क्या यह बहस किसी बड़े कानूनी मोड़ पर जाएगी?

Nishikant Dubey On Rahul Gandhi

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

मार्च 9, 2026

Nishikant Dubey On Rahul Gandhi: भारतीय जनता पार्टी (BJP) के मुखर सांसद निशिकांत दुबे ने एक बार फिर कांग्रेस नेता और विपक्ष के चेहरे राहुल गांधी पर तीखा जुबानी हमला बोला है। दिल्ली में मीडिया से बात करते हुए दुबे ने राहुल गांधी को ‘लीडर ऑफ प्रोपेगेंडा’ करार दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्षी नेता जानबूझकर देश में भ्रम की स्थिति पैदा कर रहे हैं और संसदीय मर्यादाओं का उल्लंघन कर रहे हैं। दुबे ने कहा कि उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में राहुल गांधी जैसा “जिद्दी” नेता नहीं देखा, जो तथ्यों के बजाय केवल प्रोपेगेंडा के आधार पर राजनीति करना चाहते हैं। भाजपा सांसद के इस बयान ने सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच चल रहे तनाव को और अधिक बढ़ा दिया है।

अनुच्छेद 94 और स्पीकर का पद: निशिकांत दुबे का संवैधानिक तर्क

सांसद निशिकांत दुबे ने विपक्ष की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए भारतीय संविधान के अनुच्छेद 94 का हवाला दिया। उन्होंने तर्क दिया कि देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था पूरी तरह से संविधान के दायरे में चलती है और सदन की प्रक्रियाएं भी इसी से निर्धारित होती हैं। दुबे के अनुसार, यदि विपक्ष लोकसभा स्पीकर को हटाने का नोटिस देता है, तो उस पर एक तय प्रक्रिया के तहत चर्चा होनी अनिवार्य है। उन्होंने संवैधानिक पेच पर सवाल उठाते हुए पूछा कि जब स्पीकर सदन में मौजूद नहीं हैं, तो उनके खिलाफ लाए गए प्रस्तावों या किसी अन्य विधायी कार्य पर निर्णय कौन लेगा? उन्होंने विपक्ष पर प्रक्रियात्मक अड़चनें पैदा करने का आरोप लगाया।

स्थगन प्रस्ताव पर विवाद: विधायी प्रक्रिया का उल्लंघन या राजनीति?

सदन की कार्यवाही में हो रही बाधाओं पर चर्चा करते हुए निशिकांत दुबे ने ‘स्थगन प्रस्ताव’ (Adjournment Motion) के मुद्दे को भी प्रमुखता से उठाया। उन्होंने हैरानी जताते हुए कहा कि जब कोई मामला पहले से ही सदन की कार्यसूची (List of Business) में शामिल है, तो उस पर चर्चा किए बिना विपक्ष दूसरा स्थगन प्रस्ताव कैसे ला सकता है? उन्होंने सवाल किया कि “यह किस संविधान में लिखा है?” दुबे का मानना है कि विपक्ष नियमों की अनदेखी कर रहा है और केवल सुर्खियां बटोरने के लिए नए-नए प्रस्ताव लाकर महत्वपूर्ण विधायी कार्यों में देरी कर रहा है।

विपक्ष की रणनीति पर सवाल: संसद या प्रोपेगेंडा का अखाड़ा?

भाजपा सांसद ने अपने संबोधन में बार-बार इस बात पर जोर दिया कि विपक्ष का मुख्य उद्देश्य मुद्दों पर सार्थक चर्चा करना नहीं, बल्कि सरकार की छवि को नुकसान पहुंचाना है। उन्होंने राहुल गांधी के नेतृत्व में चल रहे विपक्षी विरोध को “उछल-धक्का” की राजनीति बताया। दुबे ने कहा कि संसद को प्रोपेगेंडा का केंद्र बनाना लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। उनके अनुसार, संविधान की व्याख्या अपनी सुविधा के अनुसार नहीं की जानी चाहिए। यह विवाद अब केवल बयानों तक सीमित नहीं है, बल्कि संसद के भीतर आने वाले दिनों में नियमों की व्याख्या को लेकर एक बड़ी बहस का रूप ले सकता है।

संविधान की सर्वोच्चता और संसदीय मर्यादा का भविष्य

निशिकांत दुबे के इन आरोपों के बाद अब सबकी नजरें विपक्ष के पलटवार पर टिकी हैं। संवैधानिक विशेषज्ञों का मानना है कि अनुच्छेद 94 और स्पीकर की शक्तियों को लेकर उठ रहे सवाल संसदीय इतिहास में महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकते हैं। जहां भाजपा इसे प्रक्रियात्मक अनुशासन का मुद्दा बना रही है, वहीं विपक्ष इसे अपनी आवाज दबाने की कोशिश करार दे रहा है। दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में चर्चा इस बात की है कि क्या आगामी सत्रों में सुचारू रूप से विधायी कार्य संपन्न हो पाएंगे या फिर ‘प्रोपेगेंडा’ और ‘संविधान’ की यह लड़ाई सदन को बार-बार स्थगित कराने का कारण बनेगी।

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