Nepal Republic Day : नेपाल की राजनीति में रैपर से देश के शीर्ष पद तक पहुँचने वाले नए प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह (बालेन शाह) लगातार अपने अप्रत्याशित फैसलों से सुर्खियां बटोर रहे हैं। हाल ही में उन्होंने देश की एक और स्थापित राजनीतिक परंपरा को तोड़कर सबको चौंका दिया है। बालेन शाह नेपाल के इतिहास में ऐसे पहले प्रधानमंत्री बन गए हैं, जिन्होंने देश के राष्ट्रीय गणतंत्र दिवस के मुख्य अवसर पर राष्ट्र के नाम पारंपरिक संबोधन नहीं दिया। नेपाल में इस बड़े बदलाव को लेकर अब राजनीतिक गलियारों और आम जनता के बीच तरह-तरह की चर्चाएं और कयासबाजी तेज हो गई हैं।
नेपाल में गणतंत्र दिवस का ऐतिहासिक महत्व
उल्लेखनीय है कि नेपाल में प्रत्येक वर्ष 28 मई की तारीख को बेहद गर्व के साथ गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाता है। साल 2008 में इसी ऐतिहासिक तारीख को नेपाल को आधिकारिक तौर पर एक संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित किया गया था। इस अभूतपूर्व घोषणा के साथ ही पड़ोसी मुल्क नेपाल में करीब 240 वर्षों से चली आ रही राजशाही (राजतंत्र) का हमेशा के लिए अंत हो गया था। इसी महान लोकतांत्रिक उपलब्धि की याद में हर साल भव्य समारोह आयोजित किए जाते हैं, लेकिन इस साल प्रधानमंत्री के भाषण न देने से वर्षों पुरानी यह परंपरा पहली बार टूट गई।
राष्ट्रपति राम चंद्र पौडेल ने संभाली कमान
इस बार के विशेष गणतंत्र दिवस समारोह में प्रधानमंत्री के पारंपरिक संबोधन की कमी को पूरा करने के लिए देश के राष्ट्रपति आगे आए। प्रधानमंत्री बालेन शाह की अनुपस्थिति में राष्ट्रपति राम चंद्र पौडेल ने शुक्रवार को राजधानी काठमांडू के ऐतिहासिक टुंडीखेल सैन्य मैदान में आयोजित किए गए मुख्य राजकीय समारोह को संबोधित किया। अपने इस विशेष और पहले गणतंत्र दिवस संबोधन में राष्ट्रपति पौडेल ने देश की मौजूदा राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर कई गंभीर और महत्वपूर्ण बातें कहीं, जिन्हें काफी दूरगामी माना जा रहा है।
केवल राजनीतिक सत्ता परिवर्तन काफी नहीं: राष्ट्रपति
टुंडीखेल मैदान में उपस्थित जनसमुदाय और विशिष्ट अतिथियों को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति राम चंद्र पौडेल ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “हम सभी देशवासियों और हुक्मरानों को यह गहराई से समझना होगा कि केवल राजनीतिक व्यवस्था या शासन के ढांचे में बदलाव कर देने मात्र से इस नए युग की जन-अपेक्षाएं पूरी नहीं हो सकतीं।” उन्होंने आगे जोर देते हुए कहा कि इसके लिए राज्य की वास्तविक शक्ति के आचरण, राजनीतिक ईमानदारी, नैतिक मूल्यों और तय मानदंडों के स्वरूप में जमीनी बदलाव लाना अनिवार्य है, अन्यथा व्यावहारिक स्तर पर राजनीतिक परिवर्तन कभी सिद्ध नहीं हो पाएगा।
बालेन शाह के विशेष अनुरोध पर बदला नियम
समारोह के दौरान एक दिलचस्प बात यह देखने को मिली कि प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह कार्यक्रम स्थल पर व्यक्तिगत रूप से उपस्थित तो थे, लेकिन वे पूरे समय मौन रहे और उन्होंने मंच से कोई भाषण नहीं दिया। दरअसल, यह कोई अचानक हुआ घटनाक्रम नहीं था, बल्कि खुद बालेन शाह ने राष्ट्रपति पौडेल को एक आधिकारिक पत्र लिखकर इस विशेष समारोह को संबोधित करने का विशेष अनुरोध किया था। प्रधानमंत्री के इसी लिखित आग्रह को स्वीकार करते हुए राष्ट्रपति ने इस बार मुख्य वक्ता के रूप में देश का मार्गदर्शन किया।
सार्वजनिक मंचों से प्रधानमंत्री की लंबी चुप्पी
नेपाल की पुरानी राजनीतिक परंपराओं के अनुसार, सरकार के मुखिया यानी प्रधानमंत्री हमेशा राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, राज्य के विशिष्ट अधिकारियों और विदेशी दूतावासों के राजनयिकों की गरिमामयी उपस्थिति में देश को संबोधित करते आ रहे थे। चैत्र माह के 26वें दिन प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के बाद, बालेन शाह ने पहली बार भक्तपुर में आयोजित नेपाल सेना के एक कार्यक्रम को संबोधित किया था। लेकिन उस शुरुआती भाषण के बाद से लेकर अब तक प्रधानमंत्री बालेन ने किसी भी बड़े सार्वजनिक या राजकीय समारोह को संबोधित नहीं किया है।
शुभकामना संदेश न मिलने पर उठे गंभीर सवाल
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह रही कि प्रधानमंत्री बालेन शाह ने गणतंत्र दिवस के इस पावन अवसर पर देश की जनता को कोई औपचारिक बधाई या शुभकामना संदेश भी जारी नहीं किया। विश्लेषक इसे बेहद गंभीर मान रहे हैं। इससे भी अधिक चिंताजनक पहलू यह रहा कि नेपाल की सत्तारूढ़ गठबंधन सरकार का नेतृत्व कर रही राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) के अध्यक्ष, रबी लामिछाने ने भी इस राष्ट्रीय पर्व पर चुप्पी साधे रखी और किसी भी प्रकार की बधाई देने से पूरी तरह परहेज किया।
लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर होने की आशंकाएं तेज
देश के शीर्ष कार्यकारी प्रमुख और हजारों वीर शहीदों के सर्वोच्च बलिदान से प्राप्त हुए गणतंत्र की सरकार चलाने वाली मुख्य पार्टी की तरफ से आई इस घोर उदासीनता ने नए विवादों को जन्म दे दिया है। राष्ट्रीय पर्व पर सरकार और सत्ताधारी दल की इस तरह की बेरुखी और शुभकामनाओं की पूर्ण अनुपस्थिति ने देश के जागरूक नागरिकों और राजनीतिक विश्लेषकों के मन में कई तरह के संशय पैदा कर दिए हैं। अब इस बात की आशंकाएं और डर गहराने लगा है कि क्या पर्दे के पीछे से मौजूदा लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करने का कोई गुप्त प्रयास तो नहीं किया जा रहा है।
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