NCERT Row: न्यायपालिका पर विवादित पाठ लिखने वाले विशेषज्ञों की बढ़ी मुश्किलें, ब्लैकलिस्ट होने के बाद अब पहुंचे सुप्रीम कोर्ट

NCERT Controversy Update: एनसीईआरटी की कक्षा 8 की किताब में न्यायपालिका पर 'विवादित' पाठ लिखने वाले विशेषज्ञों—प्रोफेसर मिशेल डैनिनो, सुपर्णा दिवाकर और आलोक प्रसन्ना कुमार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। ब्लैकलिस्ट होने और संस्थानों से बाहर किए जाने के बाद, क्या उन्हें कोर्ट से राहत मिलेगी? जानिए इस महासंग्राम की पूरी कहानी।

NCERT Row

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

अप्रैल 7, 2026

NCERT Row: एनसीईआरटी (NCERT) द्वारा कक्षा 8वीं के लिए प्रकाशित सोशल साइंस की नई पाठ्यपुस्तक ‘समाज की खोज: भारत और उससे आगे’ (भाग-II) इस समय एक बड़े कानूनी और शैक्षणिक विवाद का केंद्र बन गई है। विवाद का मुख्य कारण इस किताब का चौथा अध्याय है, जिसका शीर्षक ‘हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका’ रखा गया था। इस चैप्टर में न्यायिक प्रक्रियाओं को समझाने के दौरान ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ जैसे अत्यंत संवेदनशील विषय का उदाहरण के तौर पर उल्लेख किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस सामग्री पर कड़ी आपत्ति जताते हुए इसे ‘आपत्तिजनक’ माना और तुरंत प्रभाव से इस पुस्तक के प्रकाशन और वितरण पर रोक लगा दी।

सुप्रीम कोर्ट का कड़ा एक्शन: विशेषज्ञों को ब्लैकलिस्ट करने का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए टिप्पणी की कि ऐसी सामग्री न केवल भ्रामक है, बल्कि यह देश की न्यायपालिका की गरिमा और छवि को धूमिल करने का प्रयास भी करती है। इसी के मद्देनजर, 11 मार्च को कोर्ट ने एक सख्त आदेश पारित किया था। अदालत ने निर्देश दिया कि इस विवादित अध्याय को तैयार करने वाले तीनों विशेषज्ञों—प्रोफेसर मिशेल डैनिनो, सुपर्णा दिवाकर और आलोक प्रसन्न कुमार—को तत्काल प्रभाव से किसी भी प्रकार की शैक्षणिक या आधिकारिक जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया जाए। कोर्ट के इस कदम को शिक्षा जगत में एक कड़े संदेश के रूप में देखा गया।

विशेषज्ञों की दलील: सामूहिक जिम्मेदारी और साख बचाने की गुहार

अब इस मामले में एक नया मोड़ आ गया है। ब्लैकलिस्ट किए गए तीनों शिक्षाविदों ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी याचिका दायर कर अपनी स्थिति स्पष्ट करने की मांग की है। विशेषज्ञों के वकीलों ने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की पीठ के समक्ष तर्क दिया कि यह चैप्टर किसी एक व्यक्ति की व्यक्तिगत सोच नहीं थी, बल्कि यह एक विस्तृत सामूहिक प्रक्रिया और समीक्षा का परिणाम था। उन्होंने अपील की है कि उन्हें अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर दिया जाना चाहिए, क्योंकि बिना सुनवाई के उन पर लगाए गए इन आरोपों ने उनके दशकों के करियर और सार्वजनिक साख को गहरा नुकसान पहुँचाया है।

कौन हैं ये तीन शिक्षाविद? अनुभव और उपलब्धियों का विस्तृत परिचय

इस विवाद में घिरे तीनों व्यक्ति अपने-अपने क्षेत्रों के दिग्गज माने जाते हैं, जिससे यह मामला और भी पेचीदा हो गया है:

  • प्रोफेसर मिशेल डैनिनो: वर्ष 2017 में पद्मश्री से सम्मानित डैनिनो भारतीय ज्ञान परंपरा के प्रखर विद्वान हैं और IIT गांधीनगर से जुड़े रहे हैं।
  • सुपर्णा दिवाकर: ग्रामीण विकास और शिक्षा के क्षेत्र में 30 साल का अनुभव रखने वाली सुपर्णा ‘इंडियन स्कूल ऑफ डेवलपमेंट मैनेजमेंट’ की संस्थापक सदस्य हैं।
  • आलोक प्रसन्न कुमार: ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से शिक्षित आलोक एक प्रमुख कानूनी विशेषज्ञ और ‘विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी’ के सह-संस्थापक हैं।

सुधार की दिशा में कदम: हाई पावर कमेटियों का गठन और भविष्य की रणनीति

कोर्ट की सख्ती के बाद केंद्र सरकार और एनसीईआरटी ने अनुपालन हलफनामा दाखिल कर दिया है। व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए एक तीन सदस्यीय उच्च स्तरीय कमेटी का गठन किया गया है, जिसमें सेवानिवृत्त जस्टिस इंदु मल्होत्रा, दिग्गज वकील के.के. वेणुगोपाल और कुलपति प्रकाश सिंह शामिल हैं। यह समिति राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी के साथ मिलकर विधि अध्ययन के पाठ्यक्रमों की समीक्षा करेगी। इसके अतिरिक्त, शिक्षा मंत्रालय ने भी एक 20 सदस्यीय हाई पावर कमेटी बनाई है, जो भविष्य में इस प्रकार की त्रुटियों को रोकने के लिए समग्र पाठ्यक्रम की निगरानी करेगी।

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