NASA El Nino Alert : नासा सैटेलाइट ने समुद्र के नीचे क्या पकड़ा, जिससे कांप उठे वैज्ञानिक? जानिए सच

नासा के सेंटिनल-6 सैटेलाइट ने प्रशांत महासागर के नीचे एक विशालकाय 'केल्विन वेव' को ट्रैक किया है, जो भूमध्य रेखा के साथ पूर्व की ओर बढ़ रही है। गर्म पानी की यह 2000 किमी चौड़ी दीवार 2026 में एक विनाशकारी 'सुपर अल नीनो' को जन्म दे सकती है, जिससे वैश्विक मौसम में भारी उथल-पुथल की आशंका है।

NASA El Nino Alert

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

मई 28, 2026

NASA El Nino Alert : भारत सहित दुनिया के तमाम बड़े देश इस समय रिकॉर्ड तोड़ भीषण गर्मी की मार झेल रहे हैं. इस बीच, अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा (NASA) ने वैश्विक मौसम को लेकर एक बेहद खतरनाक और डराने वाली चेतावनी जारी की है. नासा के अत्याधुनिक ‘सेंटिनल-6 माइकल फ्रीलिच’ (Sentinel-6 Michael Freilich) सैटेलाइट ने समुद्र की असीम गहराइयों में एक ऐसी अप्रत्याशित हलचल को रिकॉर्ड किया है, जो आने वाले समय में पूरी दुनिया के मौसम तंत्र को तहस-नहस कर सकती है. सैटेलाइट से मिले डेटा के अनुसार, दक्षिण अमेरिका के तटीय इलाकों से दूर समुद्र के जलस्तर में भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जो सीधे तौर पर इस बात का सबूत है कि वहां पानी का तापमान बहुत तेजी से बढ़ रहा है.

नासा के सैटेलाइट ने कैद की ‘केल्विन वेव’

नासा के वैज्ञानिकों ने प्रशांत महासागर के भीतर एक विशालकाय लहर को कैमरे में कैद किया है. वैज्ञानिक शब्दावली में इसे ‘केल्विन वेव’ (Kelvin Wave) कहा जाता है. समुद्र के भीतर गर्म पानी की यह आहट इस बात का साफ और सीधा संकेत दे रही है कि इस साल के अंत तक पूरी दुनिया एक बार फिर बेहद विनाशकारी अल-नीनो (El-Nino) चक्र की भयानक चपेट में आ सकती है. जब यह अल-नीनो पूरी तरह सक्रिय होगा, तो दुनिया के कई हिस्सों में जानलेवा सूखा, रिकॉर्ड तोड़ गर्मी और कई देशों में बेमौसम मूसलाधार बारिश और बाढ़ का तांडव देखने को मिल सकता है, जिससे कृषि और जनजीवन पूरी तरह प्रभावित होगा.

हर 10 दिन में बदलता है समुद्र का नक्शा

अंतरिक्ष एजेंसी नासा द्वारा साल 2020 में अंतरिक्ष में स्थापित किया गया ‘सेंटिनल-6 माइकल फ्रीलिच’ सैटेलाइट बेहद बारीकी से काम करता है. यह सैटेलाइट हर 10 दिन के अंतराल पर पूरी दुनिया के समुद्रों के जलस्तर की सटीक मैपिंग करता है और उसका एक विस्तृत नक्शा तैयार करता है. इसकी तकनीक इतनी आधुनिक है कि यह समुद्र के जलस्तर में होने वाले इंच के बेहद छोटे हिस्से जितने बदलाव को भी आसानी से पकड़ लेता है. जब भी पृथ्वी पर अल-नीनो के उभरने की स्थिति बनती है, तो यह सैटेलाइट विशेष रूप से समुद्र के भीतर चलने वाली इन ‘गर्म केल्विन लहरों’ की गति और दिशा पर पैनी नजर रखने लगता है.

प्रशांत महासागर को बनाती हैं आग का गोला?

कृषि और मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, समुद्र के भीतर अल-नीनो जैसी विनाशकारी भौगोलिक घटना को जन्म देने में इन केल्विन लहरों की सबसे प्रमुख भूमिका होती है. सामान्य दिनों में भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के ऊपर पूरब से पश्चिम दिशा की ओर मजबूत पूर्वी हवाएं (ट्रेड विंड्स) चलती हैं. लेकिन जब ये हवाएं कमजोर होने लगती हैं, तो उनकी जगह विपरीत दिशा से आने वाली पश्चिमी हवाएं बहने लगती हैं। हवाओं के इस बड़े उलटफेर की वजह से पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र का अत्यधिक गर्म पानी तेजी से पूरब की ओर बढ़ने लगता है. जब कई महीनों तक एक के बाद एक ये गर्म लहरें कोलंबिया, इक्वाडोर और पेरू के समुद्र तटों पर भारी मात्रा में गर्म पानी जमा कर देती हैं, तब अल-नीनो का खतरनाक रूप पूरी तरह एक्टिव हो जाता है.

महाविनाश की ओर बढ़ रही है मौजूदा लहर

नासा की प्रतिष्ठित ‘जेट प्रोपल्शन लेबोरेटरी’ (JPL) में समुद्र के जलस्तर पर रिसर्च करने वाले मुख्य वैज्ञानिक जोश विलिस ने इस कूटनीतिक स्थिति पर बड़ा खुलासा किया है. उन्होंने बताया कि इस साल अल-नीनो के सक्रिय होने की शुरुआत साल 1997 और 2015 में आए ऐतिहासिक रूप से सबसे बड़े अल-नीनो चक्रों की तुलना में थोड़ी देरी से जरूर हुई है, लेकिन अब यह बेहद खतरनाक रफ्तार पकड़ चुका है. अब वैज्ञानिकों की चिंता इस बात को लेकर है कि यह आने वाले समय में कितना विशाल और भयानक रूप धारण करता है.

15 सेंटीमीटर ऊपर उठा समुद्र का जलस्तर

सैटेलाइट से प्राप्त कड़े डेटा का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि इस साल जनवरी के अंत में माइक्रोनेशिया द्वीप के आस-पास एक बहुत ही छोटी केल्विन लहर का निर्माण हुआ था, जो फरवरी के मध्य तक आते-आते शांत हो गई थी. इसके तुरंत बाद मार्च की शुरुआत में एक नई और अधिक शक्तिशाली लहर बनी, जो धीरे-धीरे पूरब दिशा की ओर बढ़ने लगी. मई के मध्य तक आते-आते स्थिति यह हो गई है कि पेरू के आस-पास के समुद्र का जलस्तर, उसके दीर्घकालिक औसत जलस्तर की तुलना में 5.9 इंच यानी 15 सेंटीमीटर से भी ज्यादा ऊपर उठ चुका है, जो वैश्विक स्तर पर एक बड़े खतरे की घंटी है.

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