Muzaffarnagar Riots Case: उत्तर प्रदेश में साल 2013 के चर्चित मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक दंगा मामले से जुड़े समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी के कई नेताओं को बड़ी राहत मिली है। सरकार के आदेश के बाद स्पेशल एमपी/एमएलए कोर्ट ने इस मामले में दर्ज मुकदमे को वापस ले लिया है। इस फैसले के बाद पूर्व केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान, उत्तर प्रदेश के मंत्री कपिलदेव अग्रवाल, सांसद हरेंद्र मलिक, पूर्व मंत्री सुरेश राणा समेत कुल 22 आरोपियों को राहत मिली है। मामला लंबे समय से अदालत में विचाराधीन था और इसमें कई प्रमुख राजनीतिक नेताओं के नाम सामने आए थे।
2013 की पंचायत में भड़काऊ भाषण का आरोप
यह पूरा मामला अगस्त 2013 में मुजफ्फरनगर जिले के नगला मंदौड़ गांव में आयोजित एक पंचायत से जुड़ा हुआ था। 31 अगस्त 2013 को गांव में बड़ी संख्या में लोगों की मौजूदगी में पंचायत आयोजित की गई थी। आरोप लगाया गया था कि पंचायत के दौरान कुछ नेताओं और अन्य लोगों ने ऐसे भाषण दिए, जिनसे कथित तौर पर तनाव बढ़ा और सांप्रदायिक माहौल प्रभावित हुआ। इसके बाद पुलिस ने मामले में कार्रवाई शुरू की और कई लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया था।
सिखेड़ा थाने में दर्ज हुई थी एफआईआर
पंचायत के बाद पुलिस ने सिखेड़ा थाने में 21 लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की थी। एफआईआर में दंगा भड़काने और लोगों के बीच तनाव पैदा करने से संबंधित धाराएं लगाई गई थीं। जांच के दौरान मामले में कई राजनीतिक और धार्मिक नेताओं के नाम सामने आए। इसी वजह से यह केस मुजफ्फरनगर दंगों से जुड़े प्रमुख मामलों में शामिल हो गया और इसकी सुनवाई एमपी/एमएलए कोर्ट में चलती रही।
जनवरी 2025 में आरोप तय होने से बढ़ी थी हलचल
इस मामले में जनवरी 2025 में विशेष एमपी/एमएलए कोर्ट ने कई आरोपियों के खिलाफ आरोप तय किए थे। इनमें उत्तर प्रदेश के मंत्री कपिलदेव अग्रवाल, पूर्व केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान, विश्व हिंदू परिषद की नेता साध्वी प्राची और डासना के महंत स्वामी यति नरसिंहानंद समेत 19 आरोपी शामिल थे। आरोप तय होने के बाद मामले की कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ने की उम्मीद थी। हालांकि अब सरकार के आदेश के बाद मुकदमा वापस लिए जाने से इस केस की दिशा पूरी तरह बदल गई है।
22 आरोपियों को मिली बड़ी कानूनी राहत
सरकार की ओर से मुकदमा वापस लेने के आदेश के बाद अदालत ने मामले को वापस ले लिया। इससे केस में आरोपी बनाए गए 22 नेताओं और अन्य लोगों को बड़ी राहत मिली है। इस फैसले में अलग-अलग राजनीतिक दलों से जुड़े नेताओं के नाम शामिल हैं। खास बात यह है कि मामले में भाजपा और समाजवादी पार्टी से जुड़े नेताओं के साथ-साथ कुछ धार्मिक नेताओं के नाम भी सामने आए थे।
मुजफ्फरनगर दंगों से जुड़ा था मामला
मुजफ्फरनगर में साल 2013 में हुए सांप्रदायिक दंगे पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति और सामाजिक माहौल पर गहरा असर डालने वाली घटनाओं में गिने जाते हैं। इन घटनाओं के बाद बड़ी संख्या में मामले दर्ज किए गए थे। नगला मंदौड़ पंचायत से जुड़ा यह मुकदमा भी उन्हीं मामलों में शामिल था। पंचायत में दिए गए कथित भाषणों को लेकर पुलिस ने कार्रवाई की थी और लंबे समय तक अदालत में कानूनी प्रक्रिया चलती रही।
राजनीतिक गलियारों में फैसले की चर्चा
मुकदमा वापस लिए जाने के बाद यह मामला एक बार फिर राजनीतिक चर्चा में आ गया है। 2013 की घटना के बाद दर्ज मुकदमे में कई प्रभावशाली नेताओं के नाम होने के कारण इसकी सुनवाई पर लंबे समय से नजर बनी हुई थी। अब सरकार के आदेश के बाद अदालत द्वारा केस वापस लिए जाने से आरोपियों को राहत मिली है। यह फैसला उत्तर प्रदेश की राजनीति में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इस मामले में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों से जुड़े नेताओं के नाम शामिल रहे हैं।
लंबे समय से चल रही थी कानूनी प्रक्रिया
नगला मंदौड़ पंचायत से जुड़े इस मामले में पुलिस कार्रवाई के बाद आरोपियों के खिलाफ न्यायिक प्रक्रिया शुरू हुई थी। समय के साथ मामला अदालत में आगे बढ़ता रहा और जनवरी 2025 में आरोप तय होने के बाद सुनवाई ने एक महत्वपूर्ण चरण में प्रवेश किया था। अब सरकार के निर्देश पर मुकदमा वापस लिए जाने से आरोपियों के खिलाफ चल रही यह कानूनी प्रक्रिया समाप्त हो गई है। इससे संबंधित नेताओं को फिलहाल बड़ी राहत मिली है।
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