CBSE New Syllabus: एम के स्टालिन का केंद्र पर बड़ा हमला, बोले- नए सिलेबस के बहाने हिंदी थोपने की साजिश

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने सीबीएसई के नए पाठ्यक्रम ढांचे को लेकर केंद्र सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। स्टालिन का दावा है कि इस नए बदलाव के जरिए गैर-हिंदी भाषी राज्यों पर जबरन हिंदी थोपी जा रही है। क्या यह शिक्षा सुधार है या कोई गहरी राजनीतिक साजिश? जानिए पूरा विवाद।

CBSE New Syllabus

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

अप्रैल 4, 2026

CBSE New Syllabus:  तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और डीएमके (DMK) प्रमुख एम के स्टालिन ने केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित सीबीएसई (CBSE) के नए पाठ्यक्रम ढांचे पर कड़ा विरोध दर्ज कराया है। शनिवार, 4 अप्रैल 2026 को दिए अपने बयान में स्टालिन ने स्पष्ट किया कि यह बदलाव महज शिक्षा सुधार का हिस्सा नहीं है। उन्होंने इसे एक सोची-समझी राजनीतिक साजिश करार दिया, जिसका मुख्य उद्देश्य हिंदी भाषा को अन्य क्षेत्रीय भाषाओं की कीमत पर आगे बढ़ाना है। स्टालिन के अनुसार, शिक्षा के माध्यम से इस तरह का भाषाई प्रभुत्व स्थापित करना भारत के संघीय ढांचे और सांस्कृतिक विविधता के खिलाफ है।

सोशल मीडिया पर केंद्र की नीति को बताया एकतरफा

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ (पूर्व में ट्विटर) पर अपनी राय साझा करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने का दावा करने वाला यह नया ढांचा असल में ‘हिंदी थोपने’ का एक छद्म रूप है। उन्होंने तर्क दिया कि इस योजना के तहत हिंदी को विशेष महत्व दिया जा रहा है, जिससे तमिल जैसी समृद्ध और प्राचीन क्षेत्रीय भाषाओं की पहचान कम होने का खतरा है। स्टालिन ने सीधे तौर पर केंद्र से सवाल पूछा कि क्या यह नीति उन राज्यों में भी लागू होगी जहाँ हिंदी प्राथमिक भाषा है? क्या वहां के छात्रों के लिए तमिल, तेलुगु या कन्नड़ सीखना अनिवार्य किया जाएगा? अगर नहीं, तो यह समानता के सिद्धांत का उल्लंघन है।

केंद्रीय विद्यालयों में तमिल की उपेक्षा और शिक्षकों की कमी

स्टालिन ने केंद्र सरकार की कथनी और करनी में अंतर बताते हुए केंद्रीय विद्यालयों का उदाहरण पेश किया। उन्होंने आरोप लगाया कि एक तरफ सरकार भाषाओं के सम्मान की बात करती है, लेकिन दूसरी तरफ तमिलनाडु स्थित केंद्रीय विद्यालयों में तमिल भाषा को अनिवार्य विषय के रूप में शामिल नहीं किया गया है। इतना ही नहीं, उन्होंने वहां तमिल पढ़ाने वाले शिक्षकों की भारी कमी का मुद्दा भी उठाया। स्टालिन ने इसे केंद्र की “दोहरी सोच” बताया और कहा कि बिना बुनियादी ढांचे और शिक्षकों के भाषाई समानता की बातें केवल दिखावा हैं।

विपक्षी दलों से स्पष्ट रुख अपनाने की अपील

इस गंभीर मुद्दे पर मुख्यमंत्री ने तमिलनाडु की राजनीति में सक्रिय अन्य दलों, विशेष रूप से एआईएडीएमके (AIADMK) और एनडीए (NDA) के सहयोगी दलों को भी घेरा। उन्होंने मांग की कि इन दलों को भाषाई अधिकारों के इस संवेदनशील मुद्दे पर अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। स्टालिन ने जोर देकर कहा कि तमिलनाडु के हितों और उसकी भाषाई विरासत की रक्षा के लिए सभी क्षेत्रीय दलों को एकजुट होना चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि इस नीति को बिना किसी बदलाव के लागू किया गया, तो यह भारत की भाषाई विविधता के लिए एक बड़ा खतरा साबित हो सकती है।

तीन भाषा नीति: विवाद की मुख्य जड़

यह विवाद सीबीएसई द्वारा शैक्षणिक सत्र 2026-27 से लागू की जाने वाली नई ‘तीन भाषा नीति’ के कारण शुरू हुआ है। इस नीति के तहत कक्षा 6 से छात्रों को कुल तीन भाषाओं का अध्ययन करना होगा, जिनमें से कम से कम दो भाषाएं भारतीय होनी अनिवार्य हैं। हालांकि यह सुनने में समावेशी लगता है, लेकिन स्टालिन जैसे नेताओं का मानना है कि व्यावहारिक रूप से यह नीति छात्रों को तीसरी भाषा के रूप में हिंदी चुनने के लिए मजबूर करेगी, जिससे गैर-हिंदी भाषी राज्यों के छात्रों पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा और उनकी अपनी मातृभाषा की उपेक्षा होगी।

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