Middle East Tension: मिडिल ईस्ट में जारी तनाव अब सिर्फ तेल और गैस तक सीमित नहीं है। हाल ही में ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने वाली ऊर्जा सप्लाई को प्रभावित किया, जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति पर दबाव बढ़ा। अब इसी क्षेत्र में बिछी समुद्र के नीचे फाइबर ऑप्टिक इंटरनेट केबलों को भी खतरा मंडरा रहा है। यदि इन केबलों को कोई नुकसान पहुंचता है, तो सिर्फ इंटरनेट ही नहीं बल्कि बैंकिंग, डिजिटल पेमेंट, ऑनलाइन कामकाज और AI सेवाएं भी प्रभावित हो सकती हैं। इसका असर भारत समेत पूरी दुनिया पर पड़ेगा।
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सबसे ज्यादा खतरे वाले इलाके
रिपोर्ट के अनुसार, दो प्रमुख इलाके इस खतरे में सबसे अधिक शामिल हैं:
- स्ट्रेट ऑफ होर्मुज – यहां समुद्र के नीचे कई महत्वपूर्ण केबल बिछी हुई हैं। हॉर्मुज के संकरे हिस्से में पानी की गहराई केवल करीब 200 फीट है, जिससे इन केबलों को नुकसान पहुंचाना आसान हो सकता है। जानकारी के अनुसार, इस मार्ग से AEAE-1, फाल्कन, गल्फ ब्रिज इंटरनेशनल और टाटा TGN गल्फ जैसी केबलें गुजरती हैं, जो सीधे भारत के अंतरराष्ट्रीय इंटरनेट कनेक्शन को मजबूत करती हैं।
- बाब अल-मंडेब स्ट्रेट – यह रेड सी में स्थित है और यहां भी कई समुद्री केबलें मौजूद हैं। ईरान समर्थित हूथी समूह लाल सागर में जहाजों पर हमले कर रहे हैं। इन हमलों से इन समुद्री केबलों को खतरा हो सकता है, जिससे यूरोप, एशिया और अफ्रीका के इंटरनेट नेटवर्क पर प्रभाव पड़ सकता है।
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बैंकिंग और AI सेवाओं पर असर

ये समुद्र के नीचे बिछी केबलें हजारों किलोमीटर लंबी हैं और दुनिया का लगभग सारा इंटरनेट डेटा इन्हीं के जरिए चलता है। वीडियो कॉल, ईमेल, ऑनलाइन बैंकिंग ट्रांजैक्शन, क्लाउड स्टोरेज और AI सेवाएं पूरी तरह इन पर निर्भर हैं। यदि इन केबलों को नुकसान पहुंचता है, तो केवल डिजिटल कनेक्टिविटी ही बाधित नहीं होगी बल्कि वित्तीय लेन-देन और तकनीकी सेवाओं में भी बड़े पैमाने पर व्यवधान आ सकता है।
वैश्विक डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर पर असर
आज की दुनिया में ये समुद्री केबलें डिजिटल जीवन का आधार हैं। बड़ी टेक कंपनियां जैसे Amazon, Microsoft और Google यूएई और सऊदी अरब में अपने डेटा सेंटर इन केबलों से जोड़ती हैं। अगर इन पर हमला होता है, तो न केवल इंटरनेट सेवाएं प्रभावित होंगी बल्कि पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी गंभीर असर पड़ेगा। विशेषज्ञों के अनुसार, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और लाल सागर में बिछी करीब 20 बड़ी केबलों में से 17 यूरोप, एशिया और अफ्रीका को जोड़ती हैं। इसका मतलब है कि इन क्षेत्रों में इंटरनेट बाधित होने पर भारत सहित कई देशों की डिजिटल कनेक्टिविटी प्रभावित होगी।
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