Middle East Crisis: अमेरिकी राजदूत के ‘अरब भूमि’ बयान पर भड़का मुस्लिम जगत, 14 देशों ने दर्ज कराया कड़ा विरोध

इजरायल में नवनियुक्त अमेरिकी राजदूत माइक हकाबी के एक इंटरव्यू ने मुस्लिम जगत में बारूद भर दिया है। हकाबी द्वारा 'नील से फरात' तक इजरायली विस्तार के समर्थन ने सऊदी अरब और जॉर्डन जैसे सहयोगियों को भी खिलाफ खड़ा कर दिया है। क्या ट्रंप प्रशासन का यह दूत क्षेत्र में शांति की जगह विनाश लाएगा?

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

फ़रवरी 22, 2026

Middle East Crisis:  मध्य पूर्व (Middle East) में शांति स्थापना की कोशिशों को उस समय बड़ा झटका लगा, जब इजरायल में नवनियुक्त अमेरिकी राजदूत माइक हकाबी के एक बयान ने दुनिया भर में खलबली मचा दी। एक हालिया इंटरव्यू में राजदूत ने संकेत दिया कि यदि इजरायल भविष्य में पड़ोसी अरब देशों की जमीनों पर भी अपना नियंत्रण स्थापित करता है, तो वह पूरी तरह से न्यायसंगत होगा। इस टिप्पणी के सार्वजनिक होते ही सऊदी अरब, तुर्किये और कतर सहित 14 प्रमुख इस्लामिक देशों ने एकजुट होकर इसका कड़ा विरोध किया है। इस बयान को अरब जगत ने क्षेत्रीय स्थिरता और संप्रभुता के लिए एक सीधा और गंभीर खतरा करार दिया है।

नील से यूफ्रेटीस तक का जिक्र और चौंकाने वाला जवाब

विवाद की जड़ वह टीवी इंटरव्यू है, जिसमें राजदूत हकाबी से इजरायल की ऐतिहासिक और भौगोलिक सीमाओं पर सवाल पूछा गया था। उनसे पूछा गया कि क्या आधुनिक इजरायल उस विशाल भूभाग पर दावा कर सकता है जो मिस्र की ‘नील नदी’ से लेकर इराक की ‘यूफ्रेटीस नदी’ तक फैला हुआ है। इस पर हकाबी ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यदि वे (इजरायल) इस पूरे क्षेत्र को ले लेते हैं, तो इसमें कुछ भी गलत नहीं होगा। इस टिप्पणी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘विस्तारवादी नीति’ के समर्थन के रूप में देखा जा रहा है, जिसने कूटनीतिक हलकों में हलचल पैदा कर दी है।

14 देशों का सामूहिक प्रहार: दोहा से जारी हुआ कड़ा निंदा प्रस्ताव

राजदूत के इस भड़काऊ बयान के विरोध में कतर, मिस्र, जॉर्डन, यूएई, इंडोनेशिया और पाकिस्तान सहित कुल 14 देशों ने मोर्चा खोल दिया है। शनिवार रात दोहा से एक साझा बयान जारी कर इन देशों ने कहा कि इस तरह की गैर-जिम्मेदाराना टिप्पणी अंतरराष्ट्रीय कानूनों और संयुक्त राष्ट्र चार्टर (UN Charter) का खुला उल्लंघन है। सऊदी अरब और तुर्किये ने स्पष्ट किया कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय ऐसी किसी भी टिप्पणी को स्वीकार नहीं करेगा जो किसी देश की क्षेत्रीय अखंडता को चुनौती देती हो।

क्षेत्रीय स्थिरता को खतरा और अवैध कब्जे की चिंता

इस्लामिक देशों के अनुसार, अमेरिकी राजदूत के शब्द इजरायल को अरब भूमि पर अवैध कब्जे के लिए प्रोत्साहित करने जैसा है। साझा बयान में इस बात पर जोर दिया गया कि फिलिस्तीनी क्षेत्रों या किसी भी अन्य अरब भूमि पर इजरायल की कोई कानूनी संप्रभुता नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे बयानों से क्षेत्र में दशकों से चले आ रहे विवाद और अधिक हिंसक रूप ले सकते हैं। यह न केवल इजरायल-अरब संबंधों को बिगाड़ता है, बल्कि शांति वार्ताओं में अमेरिका की निष्पक्ष मध्यस्थ की भूमिका पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है।

‘ग्रेटर इजरायल’ की अवधारणा और सोशल मीडिया पर बहस

सोशल मीडिया पर विशेषज्ञों ने हकाबी के बयान को विवादित ‘ग्रेटर इजरायल’ (Greater Israel) योजना से जोड़कर देखना शुरू कर दिया है। इस योजना के मानचित्र में वर्तमान लेबनान, सीरिया, जॉर्डन और सऊदी अरब के बड़े हिस्से शामिल माने जाते हैं। अरब मुल्कों ने अमेरिका से मांग की है कि ऐसे उकसावे वाले बयानों पर तुरंत रोक लगाई जाए। गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल (GCC), अरब लीग और ओआईसी (OIC) ने भी आधिकारिक तौर पर अपनी गहरी नाराजगी दर्ज कराई है, जिससे इस मामले ने एक बड़े अंतरराष्ट्रीय विवाद का रूप ले लिया है।

राजदूत की सफाई और कूटनीतिक रिश्तों पर नकारात्मक असर

विवाद के चरम पर पहुंचने के बाद राजदूत माइक हकाबी ने अपनी सफाई में कहा कि उनके शब्दों को ‘अतिशयोक्ति’ के रूप में लिया जाना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि इजरायल अपनी मौजूदा सीमाओं का विस्तार नहीं कर रहा है, बल्कि वह केवल अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करना चाहता है। हालांकि, अरब संगठन इस स्पष्टीकरण से संतुष्ट नहीं हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस एक बयान ने इजरायल और अरब देशों के बीच सामान्य हो रहे कूटनीतिक रिश्तों (जैसे अब्राहम एकॉर्ड्स) की प्रगति को पीछे धकेल दिया है और भविष्य के लिए अविश्वास की खाई चौड़ी कर दी है।

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