Middle East Chaos: ट्रंप-नेतन्याहू के ‘गुप्त युद्ध’ से भड़के खाड़ी देश, अमेरिका और अरब संबंधों में आई बड़ी दरार

मिडिल ईस्ट में महायुद्ध का खतरा! राष्ट्रपति ट्रंप और पीएम नेतन्याहू के 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' ने खाड़ी देशों को चौंका दिया है। बिना जानकारी दिए ईरान पर किए गए हमलों से सऊदी अरब और यूएई भड़क उठे हैं। क्या अमेरिका और अरब के दशकों पुराने रिश्ते अब हमेशा के लिए खत्म हो जाएंगे?

Middle East Chaos

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

मार्च 7, 2026

Middle East Chaos: मध्य पूर्व में छिड़ी भीषण जंग अब केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं रह गई है, बल्कि इसने वाशिंगटन और उसके सबसे पुराने अरब सहयोगियों के बीच एक गहरी कड़वाहट पैदा कर दी है। सऊदी अरब, कुवैत और यूएई जैसे देशों का स्पष्ट कहना है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने ईरान पर सैन्य कार्रवाई करने से पहले उन्हें पूरी तरह अंधेरे में रखा। खाड़ी देशों के अधिकारियों के अनुसार, 28 फरवरी के शुरुआती हमलों की कोई पूर्व सूचना साझा न करना एक बड़ा ‘विश्वासघात’ है। अरब सहयोगियों का तर्क है कि यदि उन्हें समय पर जानकारी दी जाती, तो वे ईरान के संभावित पलटवार के लिए अपनी रक्षा प्रणालियों को तैयार रख सकते थे और मासूमों की जान बचाई जा सकती थी।

ईरानी हमलों की तपिश: रियाद से कुवैत तक मचा कोहराम

ईरान ने इस युद्ध में अपनी जवाबी कार्रवाई को बेहद आक्रामक बना दिया है। रियाद स्थित अमेरिकी दूतावास को निशाना बनाना और कुवैत के नागरिक बंदरगाह पर ड्रोन हमला करना इस बात का प्रमाण है कि युद्ध की आग अब सुरक्षित क्षेत्रों तक पहुँच चुकी है। कुवैत में हुए हमले में 6 अमेरिकी सैनिकों की मौत ने पेंटागन की चिंताएं बढ़ा दी हैं। आंकड़ों के अनुसार, ईरान अब तक खाड़ी देशों पर लगभग 380 मिसाइलें और 1,480 से अधिक आत्मघाती ड्रोन दाग चुका है। इन हमलों में अब तक 13 लोगों की जान जा चुकी है, जिससे इन देशों के नागरिक बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुँचा है।

सुरक्षा संकट: खत्म होते इंटरसेप्टर्स और अकेला पड़ता अरब जगत

खाड़ी देशों की सबसे बड़ी चिंता उनकी सुरक्षा को लेकर है। सऊदी अरब और अन्य सहयोगियों को महसूस हो रहा है कि अमेरिकी सेना केवल इजरायल और अपने स्वयं के ठिकानों की रक्षा को प्राथमिकता दे रही है। ईरान की कम दूरी की मिसाइलों के आसान निशाने पर होने के बावजूद, इन देशों को अपनी रक्षा के लिए अकेला छोड़ दिया गया है। स्थिति तब और गंभीर हो गई है जब इन देशों के पास मिसाइल रोधी ‘इंटरसेप्टर्स’ का स्टॉक तेजी से खत्म हो रहा है। संसाधनों की कमी और अमेरिका के उदासीन रवैये ने क्षेत्रीय सुरक्षा प्रणाली को पूरी तरह से चरमरा दिया है।

नेतन्याहू की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और ट्रंप का समर्थन

सऊदी अरब के पूर्व खुफिया प्रमुख प्रिंस तुर्की अल-फैसल ने इस युद्ध के पीछे की कूटनीति पर कड़े सवाल उठाए हैं। उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा है कि यह युद्ध इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की अपनी राजनीतिक छवि बचाने और निजी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने का परिणाम है। आरोप है कि नेतन्याहू ने राष्ट्रपति ट्रंप को इस अनावश्यक संघर्ष के लिए उकसाया और अमेरिकी विदेश नीति को इजरायली हितों के अधीन कर दिया। इस राजनीतिक खींचतान के बीच पेंटागन भी अब ईरान के अत्याधुनिक और सस्ते ड्रोन हमलों का मुकाबला करने में असमर्थ नजर आ रहा है।

रूस-ईरान गठबंधन और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर प्रहार

इस युद्ध ने अब वैश्विक अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी है। पाकिस्तान जैसे देशों में ईंधन की कीमतें 55 रुपये तक बढ़ गई हैं, जो इस युद्ध के व्यापक आर्थिक प्रभाव को दर्शाता है। इससे भी अधिक चिंताजनक बात अमेरिकी खुफिया रिपोर्ट्स हैं, जिनमें दावा किया गया है कि रूस अब सक्रिय रूप से ईरान की मदद कर रहा है। रूस द्वारा ईरान को अमेरिकी युद्धपोतों और फाइटर जेट्स की गुप्त लोकेशंस साझा करने की खबरों ने आग में घी डालने का काम किया है।

तेल संकट और शांति की धुंधली उम्मीदें

अंतरराष्ट्रीय तेल आपूर्ति अब सीधे तौर पर खतरे में है क्योंकि ईरान की मिसाइलें तेल कुओं और रिफाइनरियों को निशाना बना रही हैं। 14 देशों तक फैली इस जंग ने मिडिल ईस्ट के शक्ति संतुलन को बिगाड़ दिया है। शांति की तमाम कूटनीतिक कोशिशें विफल होती दिख रही हैं, क्योंकि रूस, ईरान और अमेरिका के बीच का यह नया सैन्य गठबंधन इस क्षेत्र को एक अंतहीन तबाही की ओर धकेल रहा है।

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