Meenakshi Natarajan News: मध्य प्रदेश से राज्यसभा उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द होने के बाद देश की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। कांग्रेस ने निर्वाचन अधिकारी (RO) के इस निर्णय को असंवैधानिक और लोकतंत्र विरोधी करार देते हुए चुनाव आयोग का दरवाजा खटखटाया है। पार्टी के शीर्ष नेताओं, जिनमें केसी वेणुगोपाल, जयराम रमेश, भूपेश बघेल, रणदीप सुरजेवाला और अभिषेक सिंघवी शामिल थे, ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार से मिलकर इस मामले की निष्पक्ष जांच और फैसले को तत्काल निरस्त करने की मांग की है।
प्रियंका चतुर्वेदी ने चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर उठाए गंभीर सवाल
बताते चले कि, शिवसेना (यूबीटी) की राज्यसभा सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने इस मामले में भाजपा नेता स्मृति ईरानी का जिक्र करते हुए चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर कड़े प्रहार किए हैं। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर तंज कसते हुए लिखा कि कैसे स्मृति ईरानी अपने विभिन्न लोकसभा हलफनामों में शैक्षणिक योग्यताओं को लेकर अलग-अलग जानकारी देने के बावजूद चुनाव लड़ती रहीं और आयोग ने शिकायतों को अनदेखा कर दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि मीनाक्षी नटराजन के खिलाफ कार्रवाई में दोहरा मापदंड अपनाया गया है, जहां एक मामूली तकनीकी चूक को आधार बनाकर उनका नामांकन खारिज कर दिया गया, जबकि उन्हें अपना पक्ष रखने का मौका तक नहीं दिया गया।
दिग्विजय सिंह ने रिटर्निंग ऑफिसर के फैसले को बताया घोर असंवैधानिक
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने रिटर्निंग ऑफिसर के फैसले को ‘पक्षपातपूर्ण’ और ‘असंवैधानिक’ करार दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि कांग्रेस इस अन्याय के खिलाफ एकजुट होकर लड़ेगी। दिग्विजय सिंह का मानना है कि नटराजन के नामांकन को खारिज करने की प्रक्रिया में नियमों की अनदेखी की गई है और राजनीतिक दुर्भावना के चलते यह कदम उठाया गया है। कांग्रेस अब इस मामले को कानूनी और राजनीतिक दोनों स्तरों पर चुनौती देने की तैयारी में है।
लोकतांत्रिक प्रक्रिया और पारदर्शिता पर गहराया संकट
मीनाक्षी नटराजन के नामांकन रद्द होने की इस घटना ने चुनाव प्रबंधन और पारदर्शिता पर गंभीर बहस छेड़ दी है। विपक्षी दलों का आरोप है कि संवैधानिक संस्थाओं का इस्तेमाल विपक्ष को कमजोर करने के लिए किया जा रहा है। कांग्रेस का कहना है कि जिस आधार पर नामांकन रद्द किया गया, वह न केवल कानूनी रूप से कमजोर है, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ भी है। अब सबकी निगाहें चुनाव आयोग के उस निर्णय पर टिकी हैं, जो इस प्रतिनिधिमंडल की शिकायत के बाद आने वाला है।










