Mauritius Maldives Relations: हिंद महासागर के दो प्रमुख द्वीपीय राष्ट्रों, मॉरीशस और मालदीव के बीच दशकों पुरानी मित्रता अब एक गंभीर कूटनीतिक दरार में तब्दील हो गई है। सामरिक रूप से महत्वपूर्ण चागोस द्वीप समूह की संप्रभुता को लेकर उभरे मतभेदों ने दोनों देशों के बीच शांति को भंग कर दिया है। अंतर्राष्ट्रीय समुद्री सीमा विवाद के इस संवेदनशील दौर में, मॉरीशस सरकार ने मालदीव के साथ अपने सभी राजनयिक संबंध तत्काल प्रभाव से निलंबित करने का कड़ा फैसला लिया है। यह अप्रत्याशित कदम मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू द्वारा चागोस पर किए गए नए दावों और अपनी पुरानी नीति में बदलाव के बाद उठाया गया है।
विवाद की जड़: मुइज्जू सरकार की बदली हुई विदेश नीति
मॉरीशस के विदेश मंत्रालय ने शुक्रवार, 27 फरवरी 2026 को एक आधिकारिक विज्ञप्ति जारी कर इस ऐतिहासिक फैसले की पुष्टि की। मंत्रालय के अनुसार, मालदीव की वर्तमान सरकार ने चागोस द्वीप समूह पर मॉरीशस की संप्रभुता को स्वीकार करने से इनकार कर दिया है, जो अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन है। राष्ट्रपति मुइज्जू ने अपने ‘स्टेट ऑफ द नेशन’ संबोधन में चागोस पर मालदीव का मजबूत पक्ष रखते हुए स्पष्ट किया कि साल 2022 में मालदीव की पिछली सरकार द्वारा मॉरीशस को दी गई मान्यता अब वैध नहीं है। मुइज्जू का तर्क है कि यह नीति परिवर्तन मालदीव के समुद्री और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए अनिवार्य है।
चागोस द्वीप समूह का इतिहास और ब्रिटेन का औपनिवेशिक नियंत्रण
चागोस द्वीप समूह हिंद महासागर के हृदय में स्थित 60 छोटे द्वीपों का एक समूह है, जिसका सामरिक महत्व वैश्विक शक्तियों के लिए अत्यंत अधिक है। साल 1965 में, मॉरीशस को स्वतंत्रता देने से ठीक पहले, ब्रिटेन ने चागोस को उससे अलग कर ‘ब्रिटिश हिंद महासागर क्षेत्र’ (BIOT) बना दिया था। इसके बदले मॉरीशस को नाममात्र का मुआवजा दिया गया, जिसे मॉरीशस ने हमेशा ‘दबावपूर्ण समझौता’ करार दिया। बाद में, ब्रिटेन ने डिएगो गार्सिया द्वीप को एक विशाल सैन्य अड्डे के निर्माण हेतु अमेरिका को पट्टे पर दे दिया, जिसके कारण वहां के हजारों मूल निवासियों को जबरन उनके घरों से बेदखल होना पड़ा।
अंतरराष्ट्रीय न्यायालय का फैसला और नया त्रिकोणीय समझौता
साल 2019 में, अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) ने मॉरीशस के पक्ष में एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाया था। न्यायालय ने कहा था कि ब्रिटेन द्वारा चागोस को अलग करना गैर-कानूनी था और औपनिवेशीकरण की प्रक्रिया अधूरी रह गई थी। संयुक्त राष्ट्र ने भी ब्रिटेन को यह द्वीप मॉरीशस को सौंपने का निर्देश दिया। हाल ही में ब्रिटेन और मॉरीशस के बीच एक समझौता हुआ, जिसके तहत मॉरीशस को संप्रभुता दी गई, लेकिन डिएगो गार्सिया पर अमेरिकी सैन्य बेस को अगले 99 वर्षों तक बनाए रखने की अनुमति दी गई। मालदीव ने इसी नए समझौते पर अपनी औपचारिक आपत्ति दर्ज की है, जिससे यह विवाद पुनः भड़क उठा।
समुद्री सीमा और आर्थिक हितों का टकराव: आगे की राह
मालदीव को डर है कि मॉरीशस और ब्रिटेन के बीच हुए नए समझौते से उसकी विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) और समुद्री सीमाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। मालदीव के कड़े विरोध के कारण मॉरीशस ने इसे अपने राष्ट्रीय गौरव और क्षेत्रीय अखंडता पर चोट माना है। फिलहाल, दोनों देशों के बीच बातचीत के सभी रास्ते बंद नजर आ रहे हैं। हिंद महासागर में उपजा यह नया राजनयिक संकट न केवल इन दो देशों के लिए, बल्कि भारत सहित क्षेत्र की अन्य शक्तियों के लिए भी चिंता का विषय है, क्योंकि इससे क्षेत्रीय सुरक्षा और भू-राजनीतिक समीकरण प्रभावित हो सकते हैं।
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