Manipur Unites: मणिपुर की नई पहचान, खेलों के जरिए उभरती दिखी एकजुटता

तनाव और विभाजन से जूझ रहे मणिपुर में आखिर कैसे खेल के मैदान बन गए भरोसे और एकता के केंद्र? क्यों अलग-अलग समुदायों के युवा अब नफरत की जगह जर्सी और ग्लव्स चुन रहे हैं, और क्या यह बदलाव राज्य के भविष्य को नई दिशा देने वाला है?

Wrriten By :

Neha Mishra

Published On :

फ़रवरी 14, 2026

Manipur Unites: मणिपुर लंबे समय से जातीय तनाव और हिंसा की चुनौतियों से जूझता रहा है। ऐसे माहौल में जहां समाज के विभिन्न समुदायों के बीच दूरी बढ़ी, वहीं खेल के मैदानों ने एक नई दिशा दिखाई है। राजनीतिक बहसों और आरोप-प्रत्यारोप से दूर, स्टेडियम, ट्रेनिंग हॉल और खेल परिसर युवाओं के लिए मेल-मिलाप के केंद्र बनते जा रहे हैं। यहां युवा नफरत की जगह ग्लव्स, बूट और जर्सी को चुन रहे हैं, जो एकता और सकारात्मक सोच का प्रतीक बन चुके हैं।

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मैदान पर नहीं होती कोई विभाजन रेखा

राज्य के अलग-अलग हिस्सों में फुटबॉल, बॉक्सिंग और एथलेटिक्स जैसे खेलों में मीतेई, कुकी, नागा, मीतेई पंगल (मुस्लिम), तांगखुल, रोंगमेई समेत कई समुदायों के खिलाड़ी साथ अभ्यास कर रहे हैं। मैदान पर उनकी पहचान सिर्फ खिलाड़ी की होती है। सभी का एक ही लक्ष्य है—मणिपुर और भारत का नाम रोशन करना। कोचों का कहना है कि खेल युवाओं को अनुशासन, सम्मान और टीमवर्क की सीख देता है, जो किसी भी समाज को मजबूत बनाने की बुनियाद है।

तनाव के दौर में खेल बने सहारा

तनाव के दौर में खेल बने सहारा
तनाव के दौर में खेल बने सहारा

अशांति के कठिन समय में भी कई स्थानीय प्रतियोगिताएं शांतिपूर्वक आयोजित होती रहीं। जिन युवाओं के मन में डर और हताशा घर कर सकती थी, उन्हें खेलों ने एक उद्देश्य दिया। अभ्यास और तैयारी ने उनके भीतर आत्मविश्वास जगाया। कई खिलाड़ियों के लिए खेल एक तरह की थेरेपी साबित हुआ—जहां गुस्सा ऊर्जा में बदला और चिंता एकाग्रता में बदल गई।

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युवाओं में बढ़ती भागीदारी

जैसे-जैसे हालात सामान्य हो रहे हैं, खेलों में युवाओं की रुचि तेजी से बढ़ी है। पहले जो मैदान सुनसान रहते थे, अब वहां उत्साह और जोश दिखाई देता है। युवा खेल को केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि करियर और बेहतर भविष्य के रूप में देखने लगे हैं। यह बदलाव बताता है कि खेल सामाजिक पुनर्निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

सरिता बॉक्सिंग एकेडमी: एक मिसाल

मयांग इंफाल स्थित सरिता बॉक्सिंग एकेडमी इस सकारात्मक बदलाव का सशक्त उदाहरण है। इसे ओलंपियन और अर्जुन पुरस्कार विजेता लैशराम सरिता देवी ने स्थापित किया है। यहां पहाड़ी और घाटी क्षेत्रों के विभिन्न समुदायों के लगभग 103 छात्र एक साथ रहकर प्रशिक्षण लेते हैं। वे हॉस्टल, भोजन और अपने सपने साझा करते हैं। सरिता का मानना है कि खेल में जाति, धर्म या समुदाय का कोई स्थान नहीं है। सभी खिलाड़ियों को समान अवसर और प्रशिक्षण दिया जाता है।

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हिंसा से पहले की साझी विरासत

सरिता याद करती हैं कि हिंसा शुरू होने से पहले कुकी समुदाय के छात्र भी अकादमी का हिस्सा थे और सभी बिना भेदभाव के साथ अभ्यास करते थे। उनका विश्वास है कि खेल वही माहौल फिर से बना सकता है, जहां मेलजोल और भाईचारा स्वाभाविक था। वे अपने छात्रों को हमेशा एकजुट रहने और सकारात्मक राह चुनने की प्रेरणा देती हैं।

खेलों का विस्तार और नए अवसर

खेलों का विस्तार और नए अवसर
खेलों का विस्तार और नए अवसर

अकादमी ने अब बॉक्सिंग के साथ-साथ फुटबॉल को भी बढ़ावा दिया है। हाल ही में कृत्रिम टर्फ मैदान शुरू किया गया है, जहां करीब 20 युवा नियमित अभ्यास कर रहे हैं। भविष्य में प्राकृतिक मैदान विकसित करने और अन्य खेलों को शामिल करने की योजना है। कई फुटबॉल खिलाड़ी शुरुआत में बॉक्सिंग सीखने आए थे, लेकिन उनकी प्रतिभा ने फुटबॉल कार्यक्रम को औपचारिक रूप देने की प्रेरणा दी।

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एकता और अनुशासन का संदेश

अकादमी के छात्र बताते हैं कि यहां दोस्ती, अनुशासन और आपसी सम्मान उनकी दिनचर्या का हिस्सा है। सरिता युवाओं को नशे और भटकाव से दूर रहने की सलाह देती हैं और खेल को बेहतर करियर तथा अनुशासित जीवन का माध्यम बताती हैं। मणिपुर में खेल केवल प्रतियोगिता नहीं, बल्कि भरोसा और भाईचारे को फिर से स्थापित करने का माध्यम बनता जा रहा है—जहां मिलकर जीतने की खुशी सबसे बड़ी होती है।