Haryana High Court का बड़ा आदेश, 36 साल से कार्यरत कर्मचारी को नियमित करने के दिए निर्देश

चंडीगढ़. पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि नियमितीकरण का दावा केवल मौखिक दावों के आधार पर स्वीकार नहीं किया जा सकता। यदि कोई कर्मचारी लंबे समय से सेवा में होने का दावा करता है तो उसे उसके समर्थन में ठोस साक्ष्य भी प्रस्तुत करने होंगे। अदालत ने कहा कि विवादित तथ्यों की जांच याचिका के अधिकार क्षेत्र में संभव नहीं है और ऐसे मामलों के लिए लेबर कोर्ट या औद्योगिक न्यायाधिकरण ही उचित मंच हैं। जस्टिस अश्विनी कुमार मिश्रा और जस्टिस रोहित कपूर की खंडपीठ ने यमुना नगर निवासी एक व्यक्ति की अपील खारिज करते हुए

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Published On :

जून 26, 2026

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चंडीगढ़.

पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि नियमितीकरण का दावा केवल मौखिक दावों के आधार पर स्वीकार नहीं किया जा सकता। यदि कोई कर्मचारी लंबे समय से सेवा में होने का दावा करता है तो उसे उसके समर्थन में ठोस साक्ष्य भी प्रस्तुत करने होंगे।

अदालत ने कहा कि विवादित तथ्यों की जांच याचिका के अधिकार क्षेत्र में संभव नहीं है और ऐसे मामलों के लिए लेबर कोर्ट या औद्योगिक न्यायाधिकरण ही उचित मंच हैं। जस्टिस अश्विनी कुमार मिश्रा और जस्टिस रोहित कपूर की खंडपीठ ने यमुना नगर निवासी एक व्यक्ति की अपील खारिज करते हुए यह टिप्पणी की।

1990 से हरियाणा में लगातार कार्यरत रहने का दावा
याची ने हाई कोर्ट में दावा किया था कि वह वर्ष 1990 से हरियाणा में लगातार कार्यरत हैं और इसलिए उनकी सेवाओं को नियमित किया जाना चाहिए। उनकी शिकायत थी कि राज्य सरकार और संबंधित अधिकारियों ने उनके नियमितीकरण के दावे पर विचार नहीं किया। मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता ने अपने दावे के समर्थन में कोई ठोस दस्तावेजी साक्ष्य पेश नहीं किया।रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री केवल वर्ष 2020 के बाद कुछ समय तक उनके कार्य करने को दर्शाती है।

ऐसे में यह तय करना कि वह वास्तव में 1990 से कार्यरत हैं या नहीं, एक विवादित तथ्य का विषय है, जिसकी जांच याचिका में नहीं की जा सकती।खंडपीठ ने अपने फैसले में एकल पीठ के उस निष्कर्ष को सही ठहराया, जिसमें कहा गया था कि याचिका में उठाए गए प्रश्न विवादित तथ्यों से जुड़े हैं और उनकी जांच साक्ष्यों के आधार पर ही संभव है।

'अप्रमाणित दावों के आधार पर नहीं दे सकते आदेश'
इसलिए याचिकाकर्ता को किसी वैकल्पिक कानूनी उपाय का सहारा लेने की स्वतंत्रता दी गई थी।हाई कोर्ट ने कहा कि यदि याची कई दशकों से सेवा में हैं तो उन्हें इसका प्रमाण सक्षम प्राधिकारी या श्रम न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करना होगा। केवल सामान्य और अप्रमाणित दावों पर नियमितीकरण का आदेश नहीं दिया जा सकता।

अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में उचित उपाय संबंधित लेबर कोर्ट या औद्योगिक न्यायाधिकरण का दरवाजा खटखटाना है, जहां साक्ष्यों के आधार पर कर्मचारी और नियोक्ता के बीच संबंध तथा सेवा अवधि का निर्धारण किया जा सकता है। इसी आधार पर अदालत ने अपील को खारिज कर दिया।

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