न्याय में देरी पर बड़ा संकट: जज नहीं बढ़े तो मध्यप्रदेश में 40 साल तक खिंच सकते हैं लंबित मुकदमे

जबलपुर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की मुख्यपीठ जबलपुर और खंडपीठ इंदौर व ग्वालियर में यदि न्यायाधीशों की मौजूदा संख्या 42 से बढ़कर 75 या 85 नहीं होती है, तो साढ़े चार लाख 80 हजार से अधिक लंबित प्रकरणों का बैकलाग खत्म करने में पांच या दस साल नहीं, बल्कि चार दशक से अधिक समय लग सकता है। एरियर कमेटी की रिपोर्ट महत्वपूर्ण इस संबंध में एरियर कमेटी की रिपोर्ट महत्वपूर्ण मानी जा रही है, जिसमें स्पष्ट किया गया है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति में देरी लंबित मामलों के बढ़ने का प्रमुख कारण है। ऐसे में हाई कोर्ट में लंबित मामलों

Wrriten By :

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Published On :

जनवरी 29, 2026

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जबलपुर
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की मुख्यपीठ जबलपुर और खंडपीठ इंदौर व ग्वालियर में यदि न्यायाधीशों की मौजूदा संख्या 42 से बढ़कर 75 या 85 नहीं होती है, तो साढ़े चार लाख 80 हजार से अधिक लंबित प्रकरणों का बैकलाग खत्म करने में पांच या दस साल नहीं, बल्कि चार दशक से अधिक समय लग सकता है।

एरियर कमेटी की रिपोर्ट महत्वपूर्ण
इस संबंध में एरियर कमेटी की रिपोर्ट महत्वपूर्ण मानी जा रही है, जिसमें स्पष्ट किया गया है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति में देरी लंबित मामलों के बढ़ने का प्रमुख कारण है। ऐसे में हाई कोर्ट में लंबित मामलों की स्थिति और उनके समाधान पर गंभीरता से ध्यान देना आवश्यक हो गया है।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 39-ए के तहत राज्य का यह दायित्व है कि प्रत्येक नागरिक को न्याय तक समान और प्रभावी पहुंच सुनिश्चित की जाए। लेकिन यदि न्याय मिलने में दशकों का समय लगे, तो यह संवैधानिक प्रावधान केवल औपचारिकता बनकर रह जाता है। वर्तमान स्थिति इसी ओर संकेत करती है।

आंकड़ों की जुबानी: सुधार की आहट या लंबी चुनौती
हालिया आंकड़ों के अनुसार मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में वर्तमान में 4,80,592 मामले लंबित हैं। अगस्त 2025 से कार्यरत न्यायाधीशों की संख्या औसतन 42–43 हो गई है, जो पिछले 20 वर्षों के औसत 30 न्यायाधीशों की तुलना में बेहतर स्थिति मानी जा रही है।

इसका परिणाम यह रहा कि अगस्त 2025 से अब तक 84,455 नए मामले दर्ज हुए, जबकि 90,045 मामलों का निपटारा किया गया। इस अवधि में कुल 5,590 मामलों की शुद्ध कमी दर्ज की गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस गति के बावजूद लंबित मामलों को पूरी तरह खत्म करने में 39 से 40 वर्ष का समय लग सकता है।

वर्ष 2024 में इंदौर बनाम कर्नाटक राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने न्याय तक पहुंच को लेकर कड़ी टिप्पणी की थी। न्यायालय ने कहा था कि न्याय तक पहुंच तभी एक संवैधानिक मूल्य है, जब न्याय त्वरित रूप से मिले। यदि न्याय प्रक्रिया अत्यधिक धीमी या महंगी हो जाए, तो यह अधिकार निरर्थक बन जाता है।

हाई कोर्ट में मामलों के अत्यधिक लंबित होने का प्रमुख कारण न्यायाधीशों की रिक्तियां हैं। 1989–90 की एरियर कमेटी ने भी यह स्पष्ट किया था कि उच्च न्यायालयों में मामलों के जमा होने का मुख्य कारण न्यायाधीशों की नियुक्ति में देरी है।

53 से बढ़ाकर 85 न्यायाधीश करने की अनुशंसा
हाई कोर्ट ने अपनी स्वीकृत क्षमता 53 से बढ़ाकर 85 न्यायाधीश करने की अनुशंसा की है, जो वर्तमान में केंद्र और राज्य सरकार के पास वित्तीय एवं प्रशासनिक स्वीकृति के लिए लंबित है।

लक्ष्य यह है कि अगले पांच वर्षों में लंबित मामलों को खत्म करने के लिए प्रतिमाह 22,000 से 23,000 मामलों का निपटारा किया जाए। इसके लिए कम से कम 75 कार्यरत न्यायाधीशों की तत्काल आवश्यकता है।

2026 में मुख्य न्यायाधीश सहित कम से कम सात न्यायाधीश सेवानिवृत्त
चुनौती यह भी है कि वर्ष 2026 में मुख्य न्यायाधीश सहित कम से कम सात न्यायाधीश सेवानिवृत्त होने वाले हैं। यदि समय पर नई नियुक्तियां नहीं हुईं, तो स्थिति फिर यथावत हो सकती है।

निष्कर्ष के तौर पर कहा गया है कि केवल मामलों का निपटारा पर्याप्त नहीं है, बल्कि न्याय न्यायपूर्ण और तर्कसंगत भी होना चाहिए। इसके लिए पर्याप्त न्यायिक शक्ति, आधुनिक डिजिटाइजेशन और विशेष बेंचों का गठन आवश्यक है। मध्य प्रदेश में पिछले दो दशकों के बाद शुरू हुआ सुधार तभी कायम रह सकता है, जब 85 न्यायाधीशों की स्वीकृति जैसे ऐतिहासिक कदम को अमल में लाया जाए। सरकार को अनुच्छेद 39-ए के तहत अपनी जवाबदेही निभाते हुए नियुक्ति प्रक्रिया में तेजी लानी चाहिए, ताकि आम जनता का न्यायपालिका पर भरोसा बना रहे।

 

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