Maharashtra Politics: राज ठाकरे की नफरती राजनीति को जनता ने नकारा, बीजेपी की प्रचंड जीत

महाराष्ट्र निकाय चुनाव 2026 के नतीजों ने राज ठाकरे की राजनीति पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। मुंबई की 227 सीटों में से मनसे और यूबीटी गठबंधन को करारी शिकस्त मिली है। क्या जनता ने राज ठाकरे की 'ठोकशाही' को पूरी तरह खारिज कर दिया है? जानिए बीजेपी की जीत के मायने।

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Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

जनवरी 16, 2026

Maharashtra Politics: महाराष्ट्र निकाय चुनाव 2026 के परिणामों ने राज्य की राजनीति की दिशा और दशा पूरी तरह बदल दी है। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने विधानसभा चुनावों की अपनी सफलता को दोहराते हुए नगर निकायों में भी प्रचंड जीत हासिल की है। इन नतीजों ने स्पष्ट संदेश दिया है कि विकास और समावेशी राजनीति के सामने संकीर्ण क्षेत्रीय विवाद अब अप्रासंगिक हो गए हैं। विशेष रूप से, महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) और उसके प्रमुख राज ठाकरे के लिए यह चुनाव किसी राजनीतिक अंत से कम नहीं माना जा रहा है।

नफरत की राजनीति का अंत: मनसे का सूपड़ा साफ

मुंबई महानगरपालिका (BMC) के रुझानों और नतीजों में राज ठाकरे की पार्टी मनसे महज तीन से चार सीटों पर सिमटती नजर आ रही है। दशकों से ‘मराठी अस्मिता’ के नाम पर गैर-मराठियों के खिलाफ हिंसा, गाली-गलौज और नफरत फैलाने वाली राजनीति को महाराष्ट्र की जनता ने पूरी तरह से खारिज कर दिया है। राज ठाकरे की पहचान अक्सर उत्तेजक भाषणों और विवादित नारों के लिए रही है, लेकिन 2026 के इन नतीजों ने साबित कर दिया है कि अब केवल भाषाई आधार पर लोगों को भड़काकर सत्ता हासिल नहीं की जा सकती।

भाषा विवाद और उत्तर भारतीयों पर विवादित बयान

निकाय चुनाव के प्रचार के दौरान राज ठाकरे ने एक बार फिर अपने पुराने ढर्रे पर चलते हुए उत्तर भारतीयों को निशाना बनाया था। उन्होंने खुले मंच से कहा था कि हिंदी भाषा को महाराष्ट्र पर थोपा जा रहा है और उन्होंने ‘लात मारने’ जैसे शब्दों का प्रयोग किया था। उन्होंने दावा किया था कि बाहरी लोग महाराष्ट्र का हिस्सा छीन रहे हैं और यदि जमीन और भाषा नहीं बची तो मराठी मानुष खत्म हो जाएगा। हालांकि, जनता ने उनके इस डरावने नैरेटिव को नकारते हुए अमन और तरक्की का रास्ता चुना।

दक्षिण भारतीयों का अपमान: ‘लुंगी-पुंगी’ वाला नारा पड़ा भारी

राज ठाकरे की कड़वाहट केवल उत्तर भारतीयों तक सीमित नहीं रही। बीजेपी के लिए चुनाव प्रचार करने आए तमिलनाडु के नेता अन्नामलाई पर भी उन्होंने निजी टिप्पणियां कीं। उन्हें ‘रसमलाई’ कहकर उनका मजाक उड़ाया और “बजाओ पुंगी, भगाओ लुंगी” जैसे अपमानजनक नारे दिए। दक्षिण भारतीयों के प्रति इस तरह के नस्लीय और क्षेत्रीय कटाक्ष ने न केवल दक्षिण भारतीय समुदाय को नाराज किया, बल्कि शिक्षित मराठी मतदाताओं को भी उनसे दूर कर दिया, जो इसे महाराष्ट्र की संस्कृति के खिलाफ मानते हैं।

उद्धव ठाकरे को हुआ भारी नुकसान: 30 साल बाद हाथ से निकली सत्ता

राज ठाकरे की इस नफरती पॉलिटिक्स की आग में उनके भाई उद्धव ठाकरे के हाथ भी जल गए। बीएमसी की सत्ता, जिस पर पिछले 30 सालों से शिवसेना का कब्जा था, अब उनके हाथ से फिसल गई है। उद्धव ने जब राज ठाकरे से हाथ मिलाया, तो उन्हें लगा था कि मराठी वोट बैंक एकजुट होगा। लेकिन इसका उल्टा असर हुआ; राज की बयानबाजी के कारण उत्तर भारतीय, गुजराती और दक्षिण भारतीय मतदाता, जो कभी उद्धव की शिवसेना (UBT) के प्रति नरम थे, वे पूरी तरह कटकर बीजेपी के पाले में चले गए।

देवेंद्र फडणवीस की ‘मराठी बनाम मराठी’ रणनीति सफल

बीजेपी और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने ठाकरे बंधुओं की ‘मराठी कार्ड’ वाली रणनीति को बड़ी चतुराई से विफल कर दिया। फडणवीस ने प्रचार के दौरान खुद को एक गर्वित मराठी के रूप में पेश किया। उन्होंने जनता से कहा, “मैं भी मराठी हूँ और नागपुर भी महाराष्ट्र का ही हिस्सा है। महाराष्ट्र के हक के लिए मैं भी लड़ता हूँ।” इस अपील ने उन मराठी वोटरों को प्रभावित किया जो विकास चाहते थे और किसी के प्रति नफरत नहीं रखना चाहते थे।

मुंबई का बदलता स्वरूप: केवल 38% मराठी मतदाता

एक महत्वपूर्ण आंकड़े के अनुसार, मुंबई में अब मराठी भाषी मतदाताओं की संख्या लगभग 38 फीसदी ही रह गई है। शेष आबादी उत्तर भारतीय, गुजराती, दक्षिण भारतीय और अन्य समुदायों की है। राज ठाकरे की कट्टरपंथी राजनीति ने उन्हें इन समुदायों से पूरी तरह अलग-थलग कर दिया। जब मराठी वोट भी बंट गए और गैर-मराठी वोट एकजुट होकर बीजेपी के पास चले गए, तो राज ठाकरे की राजनीति पर राजनीतिक ग्रहण लगना तय था।

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