Maharashtra MLC Election : एमएलसी चुनाव की बिछ गई बिसात, आखिरी दिन किसने किसे दिया धोखा, जानें यहाँ

महाराष्ट्र की सत्ता के गलियारों में सस्पेंस गहरा गया है! एमएलसी चुनाव के नामांकन के अंतिम दिन महायुति ने जहाँ अपने उम्मीदवारों की फौज उतार दी, वहीं महाविकास अघाड़ी में अंबादास दानवे के नाम पर कांग्रेस की नाराजगी ने नया मोड़ ले लिया है। क्या गठबंधन बचेगा या होगी बड़ी बगावत?

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

अप्रैल 30, 2026

Maharashtra MLC Election :  महाराष्ट्र की राजनीति में विधान परिषद (MLC) चुनाव को लेकर जारी खींचतान अब अपने निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है। नामांकन के अंतिम दिन मुंबई में जो सियासी ड्रामा देखने को मिला, उसने राज्य के राजनीतिक समीकरणों को एक नई दिशा दे दी है। 12 मई को होने वाले इस चुनाव के लिए नामांकन प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और जिस तरह से उम्मीदवारों ने पर्चे दाखिल किए हैं, उससे निर्विरोध निर्वाचन की संभावनाएं प्रबल हो गई हैं।

महायुति की घेराबंदी: बीजेपी और सहयोगियों ने उतारा भारी अमला

सत्तारूढ़ महायुति गठबंधन ने चुनाव में अपनी ताकत झोंकते हुए उम्मीदवारों की सूची को अंतिम रूप दिया। भारतीय जनता पार्टी ने अपनी रणनीति के तहत 5 दिग्गज चेहरों को मैदान में उतारा है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और प्रदेश अध्यक्ष चंद्रशेखर बावनकुले की मौजूदगी में बीजेपी उम्मीदवारों ने नामांकन दाखिल किया। पार्टी ने सुनील कर्जतकर, माधवी नाइक, विक्रम कोल्हे, प्रमोद जठार और संजय भेंडे पर भरोसा जताया है। इसके अलावा, उपचुनाव वाली सीट के लिए बीजेपी ने प्रज्ञा सातव को प्रत्याशी बनाया है, जिनके खिलाफ कोई और उम्मीदवार न होने के कारण उनकी जीत तय मानी जा रही है।

शिंदे और अजित पवार गुट का संतुलन: सीट बंटवारे का गणित

गठबंधन के अन्य साथियों की बात करें तो शिवसेना (एकनाथ शिंदे गुट) ने अपनी अनुभवी नेता नीलम गोरहे और बच्चू कडू को चुनावी मैदान में उतारा है। वहीं, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (अजित पवार गुट) की ओर से जीशान सिद्दीकी ने नामांकन दाखिल कर सबको चौंका दिया। महायुति ने सीटों का बंटवारा इस तरह किया है कि आंतरिक कलह की गुंजाइश कम रहे और सभी घटक दलों को उचित प्रतिनिधित्व मिल सके।

महाविकास आघाड़ी में घमासान: उद्धव और कांग्रेस के बीच बढ़ी रार

विपक्षी गठबंधन महाविकास आघाड़ी (MVA) के लिए नामांकन का आखिरी दिन काफी तनावपूर्ण रहा। उद्धव ठाकरे गुट और कांग्रेस के बीच एक सीट को लेकर खींचतान इतनी बढ़ गई कि गठबंधन टूटने की कगार पर नजर आने लगा। कांग्रेस ने स्पष्ट शर्त रखी थी कि यदि उद्धव ठाकरे स्वयं चुनाव नहीं लड़ते हैं, तो वह सीट कांग्रेस के खाते में जानी चाहिए। दोपहर तक मिलिंद नरवेकर, सुप्रिया सुले और अनिल परब जैसे बड़े नेताओं के बीच मैराथन बैठकें हुईं। अंततः गठबंधन की एकजुटता को प्राथमिकता देते हुए कांग्रेस ने अपने कदम पीछे खींचे और उद्धव गुट के अंबादास दानवे को समर्थन देने का फैसला किया।

निर्विरोध चुनाव की ओर महाराष्ट्र: 9 सीटों पर 9 ही दावेदार

नामांकन की समय सीमा समाप्त होने के बाद जो तस्वीर उभरी है, उसके अनुसार कुल 9 रिक्त सीटों के लिए केवल 9 ही उम्मीदवारों ने पर्चे भरे हैं। इस स्थिति में 12 मई को होने वाली वोटिंग अब महज एक संवैधानिक औपचारिकता रह गई है। यदि कोई भी उम्मीदवार अपना नाम वापस नहीं लेता है, तो सभी 9 प्रत्याशी निर्विरोध चुन लिए जाएंगे। यह न केवल सत्ता पक्ष बल्कि विपक्ष के लिए भी राहत की बात है, क्योंकि इससे क्रॉस वोटिंग और हॉर्स ट्रेडिंग का डर खत्म हो गया है।

कांग्रेस का ‘बैकफुट’ पर जाना: मजबूरी या मास्टरस्ट्रोक?

कांग्रेस द्वारा अंबादास दानवे का समर्थन करने के फैसले के पीछे ‘नंबर गेम’ की बड़ी भूमिका रही। वर्तमान में उद्धव गुट के पास 20 और शरद पवार गुट के पास 10 विधायक हैं, जिनका कुल योग 30 होता है। एक सीट जीतने के लिए 29 वोटों की आवश्यकता है। यदि कांग्रेस (16 विधायक) अपना अलग उम्मीदवार उतारती, तो विपक्षी एकता बिखर जाती और किसी भी सीट पर जीत पक्की नहीं रह पाती। कांग्रेस ने हार के जोखिम को टालने और भविष्य के राज्यसभा चुनावों में अपनी दावेदारी मजबूत करने के लिए यह रणनीतिक त्याग किया है।

निष्कर्ष: गठबंधन बचाने की कवायद और भविष्य के संकेत

इस पूरे घटनाक्रम से यह साफ हो गया है कि महाराष्ट्र में आगामी विधानसभा चुनावों से पहले विपक्षी दल किसी भी कीमत पर बिखरना नहीं चाहते। कांग्रेस ने भले ही इस बार समझौता कर लिया हो, लेकिन उसने यह स्पष्ट संदेश दे दिया है कि सीट बंटवारे के मामले में उसे हल्के में नहीं लिया जा सकता। अब सभी की निगाहें 12 मई को होने वाली आधिकारिक घोषणा पर टिकी हैं।

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