Magh Mela 2026: प्रयागराज के माघ मेले में कल्पवास का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व माना जाता है। हर वर्ष माघ महीने में हजारों श्रद्धालु संगम तट पर कल्पवास करते हैं, ताकि वे अपने पापों से मुक्ति पा सकें और जीवन की गलतियों का प्रायश्चित कर सकें। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कल्पवास के साथ शैय्या दान (सेझिया दान) करना भी अत्यंत आवश्यक माना गया है। इसी परंपरा के तहत इस समय संगम तट पर भक्त कल्पवास पूर्ण होने के बाद शैय्या दान कर रहे हैं।
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क्या होता है शैय्या दान?

शैय्या दान को शास्त्रों में पश्चाताप का दान कहा गया है। इसका उद्देश्य जीवन में किए गए पापों का नाश करना और आत्मिक शुद्धि प्राप्त करना है। इस दान में भक्त अपने घर की रोजमर्रा की उपयोगी वस्तुएं—जैसे पलंग, गद्दा, बिस्तर, कपड़े, बर्तन और अन्य घरेलू सामान—दान करते हैं। इसे एक महादान माना जाता है, क्योंकि इसमें व्यक्ति अपने सुख-सुविधा से जुड़ी वस्तुओं का त्याग करता है।
12 साल के कल्पवास के बाद अनिवार्य होता है शैय्या दान
दंडी स्वामी महेशाश्रम महाराज ने इस विषय पर जानकारी देते हुए बताया कि माघ मेले में जो भक्त 12 वर्षों तक कल्पवास करता है, उसके लिए शैय्या दान करना अनिवार्य माना गया है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, 12 साल का कल्पवास पूर्ण करने के बाद यदि शैय्या दान किया जाए, तो व्यक्ति को जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति मिलती है और वह मोक्ष को प्राप्त करता है।
कब और कैसे किया जाता है शैय्या दान?
शैय्या दान की परंपरा पौष माह की एकादशी से माघ माह की द्वादशी तक निभाई जाती है। इस अवधि में कल्पवासी संगम तट पर देवताओं का पूजन, जप-तप और ध्यान करते हैं। इसके बाद विधिवत शैय्या दान कर कल्पवास की प्रक्रिया पूर्ण की जाती है।
हर कोई नहीं ले सकता यह दान
प्रयागराज के तीर्थ पुरोहित विनय मिश्रा के अनुसार, शैय्या दान को हर ब्राह्मण ग्रहण नहीं कर सकता। यह दान केवल कुल पुरोहित को ही दिया जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि शैय्या दान को पापों का दान माना जाता है और इसे ग्रहण करने के लिए विशेष धार्मिक अधिकार की आवश्यकता होती है।
उनका कहना है कि कल्पवास तब तक पूर्ण नहीं माना जाता, जब तक शैय्या दान न किया जाए। यही कारण है कि हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालु प्रयागराज पहुंचकर इस परंपरा का पालन करते हैं।
कल्पवास की अवधि और धार्मिक महत्व
शास्त्रों में कल्पवास की विभिन्न अवधियां बताई गई हैं। इसकी न्यूनतम अवधि एक दिन से लेकर तीन दिन, तीन महीने, छह महीने, दो वर्ष, तीन वर्ष और बारह वर्ष तक हो सकती है। अवधि चाहे जितनी भी हो, कल्पवास का मूल उद्देश्य आत्मशुद्धि, संयम और ईश्वर की भक्ति माना जाता है।










