Magh Mela 2026: माघ मेले में आकर्षण का केंद्र बने बाबा शंकरपुरी, 7 साल से नहीं लगाया भूमि पर आसन

हठ योगी शंकरपुरी साधु सात साल से खड़े रहकर साधना कर रहे हैं। सोते समय भी वे सिर को सहारा देने के लिए लकड़ी का उपयोग करते हैं और सभी काम खड़े-खड़े ही करते हैं।

Magh Mela 2026

Wrriten By :

Nivedita Kasaudhan

Published On :

जनवरी 6, 2026

Magh Mela 2026: संगम की रेती पर सजे माघ मेले में इस बार भक्ति और अध्यात्म के साथ-साथ कठिन तपस्या के अनूठे रंग देखने को मिल रहे हैं। कड़ाके की ठंड और मंत्रोच्चार के बीच एक ऐसा युवा साधु भक्तों के बीच आकर्षण का केंद्र बना हुआ है, जिसने पिछले सात वर्षों से बैठने या लेटने का त्याग कर दिया है। ये हैं 26 वर्षीय साधु शंकरपुरी, जिनकी कठिन ‘खड़ेश्वरी’ तपस्या को देखकर हर कोई नतमस्तक है।

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कौन हैं हठ योगी शंकरपुरी?

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आकर्षण का केंद्र बने बाबा शंकरपुरी

मूल रूप से बिहार के सीतामढ़ी जिले के रहने वाले शंकरपुरी का जीवन बचपन से ही वैराग्य की ओर झुक गया था। वे बताते हैं कि वे मात्र 6 साल की उम्र में संत बन गए थे। वर्तमान में उत्तर प्रदेश के सीतापुर स्थित नैमिषारण्य (88 हजार ऋषियों की तपोभूमि) में उनका आश्रम है। शंकरपुरी का कहना है कि नैमिषारण्य की पवित्र धरती से ही उन्हें इस कठिन तपस्या की प्रेरणा मिली और पिछले सात सालों से उन्होंने भूमि पर आसन नहीं लगाया है।

खड़े रहकर ही पूरे करते हैं दिनचर्या के सभी काम

आमतौर पर इंसान के लिए कुछ घंटे लगातार खड़ा रहना भी मुश्किल होता है, लेकिन शंकरपुरी के लिए यह जीवन जीने का तरीका बन चुका है। मेले में उन्हें अक्सर एक पैर पर खड़े होकर मंत्र जाप करते देखा जा सकता है।

भोजन और पूजा: वे खड़े-खड़े ही भोजन ग्रहण करते हैं और अपनी नित्य पूजा-पाठ की क्रियाएं भी इसी मुद्रा में संपन्न करते हैं।

सोने का अनोखा तरीका: जब उनसे उनके आराम करने के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने बताया कि वे कभी लेटते नहीं हैं। सोने के लिए वे एक लकड़ी के झूले (पालने) जैसी संरचना का सहारा लेते हैं, जिस पर वे अपना सिर टिकाकर खड़े-खड़े ही नींद पूरी करते हैं।

तपस्या के पीछे का आध्यात्मिक उद्देश्य

शंकरपुरी की यह प्रतिज्ञा ‘हठ योग’ का एक हिस्सा है, जिसे ‘खड़ेश्वरी तप’ कहा जाता है। हिंदू धर्म में ऐसी तपस्या का उद्देश्य इंद्रियों पर विजय प्राप्त करना और ईश्वर के प्रति अपनी अटूट श्रद्धा को सिद्ध करना होता है। माघ मेले में आने वाले श्रद्धालु उनकी इस जिजीविषा और संकल्प को देख चकित हैं। संगम तट पर उनकी कुटिया के बाहर सुबह से ही दर्शनार्थियों का तांता लगा रहता है।

कठिन तपस्या और आस्था का संगम

प्रयागराज का माघ मेला सदियों से ऐसे ही साधु-संतों की तपस्थली रहा है, जो अपने कठिन अनुशासन और विचित्र तपस्या के माध्यम से दुनिया को अध्यात्म की शक्ति दिखाते हैं। इस साल माघ मेला 3 जनवरी 2026 से आरंभ हो चुका है और 15 फरवरी तक चलेगा। 44 दिनों तक चलने वाले इस धार्मिक महाकुंभ में लाखों भक्त संगम की पवित्र त्रिवेणी में डुबकी लगाकर पुण्य प्राप्त कर रहे हैं।

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