Lucknow Poster War : परशुराम जयंती पर छुट्टी क्यों नहीं? सपा के पोस्टरों ने लखनऊ में मचाया हड़कंप

परशुराम जयंती की पूर्व संध्या पर लखनऊ में समाजवादी पार्टी के दफ्तर के बाहर लगे पोस्टरों ने योगी सरकार की नींद उड़ा दी है। "परशुराम जयंती पर छुट्टी क्यों खत्म की?" जैसे नारों के साथ भाजपा को घेरने की यह तैयारी क्या 2027 के चुनाव की आहट है?

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

अप्रैल 18, 2026

Lucknow Poster War : उत्तर प्रदेश की राजनीति में ‘पोस्टर वॉर’ का सिलसिला पुराना है, लेकिन इस बार लखनऊ में समाजवादी पार्टी (सपा) के प्रदेश मुख्यालय के बाहर लगे एक पोस्टर ने सियासी तापमान को सातवें आसमान पर पहुँचा दिया है। भगवान परशुराम जयंती के अवसर पर लगे इस पोस्टर ने न केवल धार्मिक भावनाओं को छुआ है, बल्कि राज्य के सबसे प्रभावशाली ‘ब्राह्मण वोट बैंक’ को लेकर भी नई जंग छेड़ दी है। लखनऊ की सड़कों पर गुजरने वाला हर शख्स इस पोस्टर को देख रहा है, जो सीधे तौर पर सत्ताधारी भाजपा और विपक्षी सपा के बीच वैचारिक टकराव को प्रदर्शित कर रहा है।

मुख्यमंत्री योगी से सीधा सवाल: छुट्टी क्यों की गई खत्म?

सपा कार्यालय के ठीक बाहर लगे इस विशाल पोस्टर में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कार्यप्रणाली पर कड़ा प्रहार किया गया है। पोस्टर पर बड़े अक्षरों में लिखा गया है— “परशुराम जयंती पर सार्वजनिक अवकाश की शुरुआत सपा सरकार में हुई थी, लेकिन आपने इसे खत्म क्यों कर दिया?” यह सवाल सीधे तौर पर भाजपा सरकार की ब्राह्मण विरोधी छवि गढ़ने की एक कोशिश मानी जा रही है। सपा का दावा है कि अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली तत्कालीन सरकार ने भगवान परशुराम के सम्मान में सरकारी छुट्टी घोषित की थी, जिसे वर्तमान सरकार ने सत्ता में आते ही निरस्त कर दिया।

आशीष चतुर्वेदी के पोस्टर से सियासी गलियारों में मची खलबली

यह विवादित और चर्चित पोस्टर मेजर आशीष चतुर्वेदी द्वारा लगाया गया है। जैसे ही यह पोस्टर सोशल मीडिया और समाचार चैनलों पर वायरल हुआ, राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया। सपा समर्थकों का कहना है कि यह पोस्टर केवल एक सवाल नहीं, बल्कि उस सच्चाई का आईना है जिसे भाजपा छिपाना चाहती है। वहीं, भाजपा नेताओं की ओर से भी जवाबी हमले की तैयारी शुरू हो गई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के पोस्टर केवल प्रतीकात्मक नहीं होते, बल्कि इनके पीछे एक सोची-समझी चुनावी बिसात होती है।

सार्वजनिक अवकाश की मांग और ब्राह्मण समाज की एकजुटता

भगवान परशुराम जयंती पर सार्वजनिक अवकाश की मांग अब केवल पोस्टरों तक सीमित नहीं रह गई है। विभिन्न ब्राह्मण संगठनों और सामाजिक संस्थाओं ने भी इस मांग को लेकर अपनी आवाज बुलंद करना शुरू कर दिया है। समाज के प्रतिनिधियों का तर्क है कि भगवान परशुराम करोड़ों लोगों की आस्था के केंद्र हैं, अतः उनकी जयंती पर राजकीय अवकाश बहाल किया जाना चाहिए। यह मुद्दा अब धीरे-धीरे एक जन आंदोलन का रूप ले रहा है, जिससे सरकार पर दबाव बढ़ता दिख रहा है।

ब्राह्मण वोट बैंक: यूपी की सत्ता की चाबी किसके हाथ?

उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों पर ब्राह्मण मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं। यही कारण है कि सपा, भाजपा और यहाँ तक कि बसपा भी इस वर्ग को लुभाने का कोई मौका नहीं छोड़ती। सपा ने पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे के किनारे भगवान परशुराम की भव्य प्रतिमा लगाकर पहले ही अपनी मंशा साफ कर दी थी। अब छुट्टी का मुद्दा उठाकर सपा यह संदेश देना चाहती है कि ब्राह्मणों का असली हितैषी कौन है। उधर, भाजपा इस बात पर जोर दे रही है कि उसने बिना किसी भेदभाव के सभी वर्गों के महापुरुषों का सम्मान किया है।

पोस्टरों से शुरू हुई बहस का भविष्य

फिलहाल लखनऊ का यह पोस्टर उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत कर चुका है। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस मांग पर कोई संज्ञान लेते हैं या फिर भाजपा इसे ‘विपक्षी प्रोपेगेंडा’ बताकर दरकिनार कर देती है। 2026 और उसके बाद होने वाले चुनावों की आहट के बीच, परशुराम जयंती की छुट्टी का यह विवाद आने वाले दिनों में और भी ज्यादा गहराने के आसार हैं। यह साफ है कि आने वाले समय में ‘हिंदुत्व’ बनाम ‘सामाजिक न्याय’ की लड़ाई में ब्राह्मण समाज एक बार फिर केंद्र बिंदु में होगा।

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