Lindsey Graham Death: अमेरिकी सीनेट के कद्दावर नेता और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अत्यंत करीबी सहयोगी माने जाने वाले लिंडसे ग्राहम का शनिवार शाम अचानक हुई एक बीमारी के चलते निधन हो गया। उनके कार्यालय ने रविवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) के माध्यम से इस दुखद खबर की पुष्टि की। सीनेटर के निधन की सूचना मिलते ही अमेरिकी राजनीतिक गलियारों में शोक की लहर दौड़ गई है। ग्राहम के परिवार ने एक आधिकारिक बयान जारी कर लोगों से प्रार्थनाओं में याद रखने का अनुरोध किया है और इस बेहद कठिन समय में उनकी निजता (प्राइवेसी) का सम्मान करने की अपील की है।
भारत पर प्रस्तावित ‘500% टैरिफ बिल’ को लेकर थे सुर्खियों में
सीनेटर लिंडसे ग्राहम अपने निधन से कुछ समय पूर्व एक अत्यंत विवादास्पद और महत्वपूर्ण बिल को लेकर चर्चा में थे। रिपोर्ट के अनुसार, वे एक ऐसे विधेयक को सीनेट में पारित करवाने की पुरजोर तैयारी कर रहे थे, जिसमें रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर भारी-भरकम शुल्क लगाने का प्रावधान था। इस प्रस्तावित कानून के दायरे में भारत सहित वे सभी देश आ रहे थे जो रूस से तेल का आयात कर रहे थे। इस बिल में भारत पर 500 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का प्रस्ताव शामिल था, जिसे लेकर उन्होंने ट्रंप प्रशासन के साथ समझौता भी कर लिया था। अब उनके निधन के बाद इस प्रस्तावित विधेयक और इससे जुड़ी कूटनीतिक रणनीतियों पर भविष्य में क्या रुख अपनाया जाएगा, यह एक बड़ा प्रश्न बन गया है।
दक्षिण कैरोलिना से लेकर वाशिंगटन तक का शानदार राजनीतिक सफर
लिंडसे ग्राहम का राजनीतिक करियर उपलब्धियों भरा रहा है। दक्षिण कैरोलिना के निवासी ग्राहम ने अपनी जनसेवा की शुरुआत की और वर्ष 2002 में पहली बार अमेरिकी सीनेट के लिए चुने गए। उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने 2008, 2014 और 2020 के चुनावों में लगातार जीत हासिल की। वर्ष 2008 के आम चुनाव में उन्होंने इतिहास रचते हुए अपने राज्य में 10 लाख से अधिक वोट पाने वाले पहले राजनेता होने का गौरव प्राप्त किया था। वे रिपब्लिकन पार्टी के सबसे प्रभावशाली चेहरों में से एक थे और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों के सबसे मुखर समर्थकों में गिने जाते थे।
विरासत और भविष्य की राजनीतिक चुनौतियां
लिंडसे ग्राहम का निधन राष्ट्रपति ट्रंप के खेमे के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है, क्योंकि वे न केवल एक अनुभवी सीनेटर थे, बल्कि ट्रंप की कूटनीतिक और आर्थिक नीतियों को सदन में आगे बढ़ाने के मुख्य रणनीतिकार भी थे। उनके द्वारा लाए गए टैरिफ संबंधी बिल ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक संबंधों को लेकर हलचल पैदा कर दी थी। अब उनके निधन के बाद, वाशिंगटन में यह देखना दिलचस्प होगा कि उनकी खाली जगह कौन लेता है और क्या ट्रंप प्रशासन भारत के प्रति अपनाए गए उस कड़े रुख को जारी रखता है, जिसके लिए ग्राहम ने जमीन तैयार की थी। फिलहाल, अमेरिकी राजनीति का एक प्रभावशाली अध्याय उनके साथ ही समाप्त हो गया है, और उनके समर्थक उन्हें एक प्रखर राष्ट्रवादी नेता के रूप में याद कर रहे हैं।
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