अब दस्तावेज सही होने पर नहीं रोकी जा सकेगी जमीन की रजिस्ट्री, हाई कोर्ट ने सरकार को दिया आदेश

रांची  झारखंड हाई कोर्ट के जस्टिस राजेश शंकर की अदालत में राज्य में जमीन की रजिस्ट्री को लेकर एक महत्वपूर्ण आदेश पारित किया है। अदालत ने राज्य सरकार को नेशनल जेनरिक डॉक्यूमेंट रजिस्ट्रेशन सिस्टम पोर्टल (एनजीडीआरएस) पर दर्ज प्रतिबंधित जमीनों की सूची तत्काल हटाने का निर्देश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि राज्य के सब-रजिस्ट्रार जमीन से संबंधित दस्तावेज यदि रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1908 और बिहार रजिस्ट्रेशन रूल्स, 1937 की निर्धारित शर्तों को पूरा करते हैं, तो उनकी रजिस्ट्री करने से इन्कार नहीं कर सकते। अदालत ने राजस्व, निबंधन एवं भूमि सुधार विभाग के सचिव को राज्य के सभी

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Published On :

नवम्बर 6, 2026

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रांची
 झारखंड हाई कोर्ट के जस्टिस राजेश शंकर की अदालत में राज्य में जमीन की रजिस्ट्री को लेकर एक महत्वपूर्ण आदेश पारित किया है। अदालत ने राज्य सरकार को नेशनल जेनरिक डॉक्यूमेंट रजिस्ट्रेशन सिस्टम पोर्टल (एनजीडीआरएस) पर दर्ज प्रतिबंधित जमीनों की सूची तत्काल हटाने का निर्देश दिया है।

अदालत ने स्पष्ट किया है कि राज्य के सब-रजिस्ट्रार जमीन से संबंधित दस्तावेज यदि रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1908 और बिहार रजिस्ट्रेशन रूल्स, 1937 की निर्धारित शर्तों को पूरा करते हैं, तो उनकी रजिस्ट्री करने से इन्कार नहीं कर सकते। अदालत ने राजस्व, निबंधन एवं भूमि सुधार विभाग के सचिव को राज्य के सभी उपायुक्तों के लिए आवश्यक सर्कुलर जारी करने का भी निर्देश दिया है।

इस संबंध में अमित रंजन की ओर से हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की गई थी। याचिकाकर्ता ने हजारीबाग जिले के बोंगा गांव स्थित खाता संख्या 154, प्लाट संख्या 2606 की 42 डिसमिल जमीन को प्रतिबंधित सूची से हटाने की मांग की थी।

उनका कहना था कि उनकी जमीन का नाम रजिस्ट्रेशन एक्ट की धारा 22-ए के तहत तैयार प्रतिबंधित सूची में दर्ज है। उपायुक्त के समक्ष आवेदन देने के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से सुप्रीम कोर्ट के और झारखंड हाई कोर्ट की खंडपीठ के पूर्व के फैसले का हवाला दिया गया।

अदालत ने कहा कि हाई कोर्ट की खंडपीठ पहले ही रजिस्ट्रेशन एक्ट की धारा 22-ए और 26 अगस्त 2015 की अधिसूचना को निरस्त कर चुकी है। इस फैसले में बिहार सरकार की ओर से बनाए गए प्रविधान को झारखंड में अपनाए जाने और सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बाध्यकारी माना गया था।

सब-रजिस्ट्रार को मालिकाना हक तय करने का अधिकार नहीं
अदालत ने स्पष्ट किया गया है कि रजिस्ट्रेशन अधिकारी का काम दस्तावेज का निबंधन करना है, न कि जमीन के मालिकाना हक का फैसला करना। सब-रजिस्ट्रार यह तय नहीं कर सकता कि विक्रेता के पास जमीन का वैध स्वामित्व है या नहीं।

यदि दस्तावेज निर्धारित कानूनी और प्रक्रियागत शर्तों को पूरा करते हैं तथा आवश्यक स्टांप शुल्क और निबंधन शुल्क जमा है, तो रजिस्ट्री से इन्कार नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल रजिस्ट्री हो जाने से जमीन पर वैध मालिकाना हक साबित नहीं हो जाता। 

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