Land for Job Case: लालू यादव को दिल्ली हाई कोर्ट से बड़ा झटका, FIR रद्द करने वाली याचिका खारिज

Lalu Yadav Update: क्या लालू प्रसाद यादव की सियासी पारी पर 'लैंड फॉर जॉब' केस भारी पड़ेगा? दिल्ली हाई कोर्ट ने सीबीआई की एफआईआर और चार्जशीट को चुनौती देने वाली उनकी याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है। आखिर कोर्ट ने क्यों कहा कि याचिका में कोई दम नहीं है? जानें इस फैसले का पूरा सच!

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

मार्च 24, 2026

Land for Job Case: राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के सुप्रीमो और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव को ‘जमीन के बदले नौकरी’ (Land for Job) मामले में कानूनी मोर्चे पर एक बड़ा झटका लगा है। दिल्ली हाईकोर्ट ने लालू यादव द्वारा दायर उस याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने सीबीआई (CBI) की एफआईआर और चार्जशीट को रद्द करने की मांग की थी। अदालत के इस फैसले के बाद अब लालू यादव के खिलाफ इस मामले में ट्रायल की प्रक्रिया जारी रहेगी। न्यायमूर्ति रविंदर डुडेजा की पीठ ने याचिका पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि इस कानूनी चुनौती में कोई ठोस आधार नहीं है।

अदालत की सख्त टिप्पणी: याचिका में नहीं मिला कोई दम

जस्टिस रविंदर डुडेजा ने पूर्व रेल मंत्री की उस दलील को अमान्य करार दिया, जिसमें 2022, 2023 और 2024 में दाखिल तीन अलग-अलग आरोपपत्रों (Charge sheets) को चुनौती दी गई थी। लालू यादव ने निचली अदालत द्वारा इन आरोपपत्रों पर संज्ञान लेने के आदेश को भी रद्द करने का अनुरोध किया था। फैसला सुनाते हुए न्यायाधीश ने संक्षिप्त और स्पष्ट टिप्पणी की, “इस याचिका में कोई दम नजर नहीं आता, इसलिए इसे खारिज किया जाता है।” इस आदेश के साथ ही सीबीआई द्वारा की गई जांच की वैधानिकता पर अदालत ने अपनी मुहर लगा दी है।

क्या है ‘जमीन के बदले नौकरी’ घोटाला? जानिए पूरा मामला

यह विवाद उस समय का है जब लालू प्रसाद यादव 2004 से 2009 के बीच केंद्र सरकार में रेल मंत्री थे। आरोपों के अनुसार, उस दौरान मध्य प्रदेश के जबलपुर में भारतीय रेलवे के पश्चिम मध्य जोन में ‘ग्रुप डी’ (Group D) के पदों पर कई नियुक्तियां की गईं। सीबीआई का दावा है कि इन नियुक्तियों के बदले में उम्मीदवारों या उनके परिजनों ने लालू यादव के परिवार के सदस्यों या उनके करीबियों के नाम पर जमीन के प्लॉट उपहार स्वरूप दिए या बेहद कम कीमतों पर हस्तांतरित किए। जांच एजेंसियों के अनुसार, यह सरकारी पद का दुरुपयोग कर अवैध रूप से संपत्ति अर्जित करने का एक सुनियोजित मामला है।

लालू यादव की दलील: ‘मंजूरी’ के बिना शुरू की गई कानूनी कार्रवाई

77 वर्षीय राजद प्रमुख ने अपनी याचिका में मुख्य रूप से तकनीकी आधार पर बचाव का प्रयास किया था। उनकी ओर से वरिष्ठ वकीलों ने दलील दी कि भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम (Prevention of Corruption Act) की धारा 17ए के तहत सीबीआई ने उनके खिलाफ जांच शुरू करने या मुकदमा चलाने के लिए आवश्यक पूर्व मंजूरी (Prior Sanction) हासिल नहीं की थी। याचिका में कहा गया था कि बिना उचित कानूनी प्रक्रिया और सक्षम प्राधिकारी की अनुमति के दर्ज की गई एफआईआर और दाखिल चार्जशीट कानूनी रूप से टिकने योग्य नहीं हैं। हालांकि, अदालत ने इन दलीलों को अपर्याप्त माना।

एफआईआर का इतिहास और वर्तमान स्थिति

इस मामले में पहली औपचारिक एफआईआर 18 मई, 2022 को दर्ज की गई थी। इसमें लालू प्रसाद यादव के साथ उनकी पत्नी राबड़ी देवी, दो बेटियों, कई अज्ञात सरकारी अधिकारियों और निजी व्यक्तियों को नामजद किया गया था। सीबीआई ने अब तक कई दौर की पूछताछ और छापेमारी की है। वर्तमान में लालू यादव, राबड़ी देवी और उनकी बेटियां इस मामले में जमानत पर बाहर हैं। हाईकोर्ट के इस ताजा रुख के बाद अब लालू यादव के पास सुप्रीम कोर्ट जाने का विकल्प बचा है, लेकिन फिलहाल उनके लिए कानूनी मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं।

बिहार की राजनीति पर कानूनी कार्रवाई का साया

लालू यादव के खिलाफ इस अदालती आदेश का असर बिहार की राजनीति पर भी पड़ना तय है। विपक्षी दल इसे भ्रष्टाचार के खिलाफ एक बड़ी कार्रवाई के रूप में देख रहे हैं, जबकि आरजेडी इसे राजनीतिक प्रतिशोध बता रही है। चुनाव के करीब आते समय इस तरह के अदालती फैसले पार्टी के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हो सकते हैं।

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