खील-बताशों के बिना अधूरी मानी जाती है लक्ष्मी पूजा, जानें क्या है धार्मिक मान्यता

 Diwali 2026: दीवाली पर दीयों को रोशनी में और मिठाइयों की रौनक देखते ही बनती है। दीपावली का पर्व मां लक्ष्मी के स्वागत और सुख-समृद्धि की कामना का पर्व होता है। इस दिन लोग घरों में विधि-विधान से माता लक्ष्मी की पूजा गणपति के साथ करते हैं और उन्हें प्रसन्न करने के लिए अलग-अलग तरह के भोग लगाते हैं। दीयों की रोशनी में डूबी हुई दीवाली की रात वास्तव में कुछ खास होती है। पूजा की थाली में दीपक, फूल, मिठाई और फल के साथ खील-बताशे भी विशेष रूप से सजाए जाते हैं और माता लक्ष्मी को खील बताशों का

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Published On :

नवम्बर 7, 2026

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 Diwali 2026: दीवाली पर दीयों को रोशनी में और मिठाइयों की रौनक देखते ही बनती है। दीपावली का पर्व मां लक्ष्मी के स्वागत और सुख-समृद्धि की कामना का पर्व होता है। इस दिन लोग घरों में विधि-विधान से माता लक्ष्मी की पूजा गणपति के साथ करते हैं और उन्हें प्रसन्न करने के लिए अलग-अलग तरह के भोग लगाते हैं।

दीयों की रोशनी में डूबी हुई दीवाली की रात वास्तव में कुछ खास होती है। पूजा की थाली में दीपक, फूल, मिठाई और फल के साथ खील-बताशे भी विशेष रूप से सजाए जाते हैं और माता लक्ष्मी को खील बताशों का भोग लगाया जाता है

आपने भी गौर किया होगा कि दिवाली पर खील-बताशे खरीदने और उन्हें पूजा में चढ़ाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर माता लक्ष्मी की पूजा में खील-बताशे ही क्यों चढ़ाए जाते हैं? आइए आपको बताते हैं इससे जुड़ी कुछ मान्यताओं के बारे में।

खीर-बताशे क्या होते हैं?
खील और बताशे एक पारंपरिक मिठाई हैं जो सदियों से दीवाली के पर्व का एक अहम हिस्सा हैं। इसमें मुख्य रूप से दो चीजें होती हैं खीर यानी कि धान का लावा और बताशे यानी चीनी से तैयार की गई एक पारंपरिक मिठाई। खील तैयार करने के लिए कच्चे चावल को रेत या नमक में भूना जाता है, जिससे वो फूल जाते हैं और खील का रूप ले लेते हैं।

वहीं, बताशे बनाने के लिए चीनी को पानी में तब तक उबाला जाता है जब तक कि वह गाढ़ी न हो जाए, फिर इसे सिक्के के आकार में ढाला जाता है।

माता लक्ष्मी को क्यों चढ़ता है खील-बताशे का भोग
दीवाली के दौरान, पूजा-पाठ के अहम हिस्से के रूप में माता लक्ष्मी को खील-बताशे का भोग लगाया जाता है। खील को पवित्रता और नई फसल से जोड़ा जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस दौरान धान की नई फसल तैयार होती है, इसलिए नई फसल को सम्मान देने और माता लक्ष्मी का आभार दिखाने का एक अच्छा तरीका माना जाता है।

वहीं सफेद बताशे पवित्रता और समृद्धि का प्रतीक माने जाते हैं। साथ ही, इसे शुक्र ग्रह का प्रतीक भी माना जाता है जो शीतलता और संतुलन बनाए रखने वाली ऊर्जा को भी दिखाते हैं।

माता लक्ष्मी को खील-बताशे चढ़ाने का महत्व
खील को पवित्रता का प्रतीक माना जाता है, जबकि बताशे मिठास और शुभता को दर्शाते हैं। ऐसा माना जाता है कि इनका भोग लगाने से देवी-देवता प्रसन्न होते हैं और धन, समृद्धि तथा सफलता का आशीर्वाद मिलता है। खील यानी धान मुख्य रूप से चावल का ही एक रूप हैं और मुख्य रूप से उत्तर भारत में खाया जाने वाला सबसे प्रमुख अनाज है।

वहीं दीवाली के ठीक पहले चावल की फसल तैयार होती है इसी वजह से सबसे पहले खील माता लक्ष्मी को चढ़ाया जाता है। साथ ही, माता लक्ष्मी से धन वैभव और समृद्धि की कामना भी की जाती है। शुक्र ग्रह को प्रसन्न करने और धन-वैभव पाने के लिए माता लक्ष्मी को खील चढ़ाई जाती है।

वास्तव में यह सिर्फ एक परंपरा नहीं है बल्कि माता लक्ष्मी की कृपा पाने का एक तरीका है, जो समृद्धि की देवी का सम्मान व्यक्त करने का एक माध्यम भी है।

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