Kerala Election 2026: भारतीय निर्वाचन आयोग ने देश के चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में चुनावी बिगुल फूंकने के साथ ही राजनीतिक दलों के लिए कड़े दिशा-निर्देश जारी कर दिए हैं। आयोग ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई भी राजनीतिक दल अखबारों, टीवी चैनलों या किसी भी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में विज्ञापन देना चाहता है, तो उसे अनिवार्य रूप से चुनाव आयोग से पूर्वानुमति लेनी होगी। यह कदम चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता और शुचिता बनाए रखने के उद्देश्य से उठाया गया है। आयोग का मानना है कि अनियंत्रित विज्ञापन मतदाताओं के निर्णय को प्रभावित कर सकते हैं, इसलिए विज्ञापनों की सामग्री की जांच करना अब बेहद जरूरी हो गया है।
केरलम चुनाव: मतदान से 48 घंटे पहले मीडिया विज्ञापनों पर पाबंदी
केरलम विधानसभा चुनाव को लेकर निर्वाचन आयोग ने इस बार और भी सख्त रुख अपनाया है। मतदान की तारीख से ठीक चार दिन पहले, आयोग ने एक ऐतिहासिक घोषणा करते हुए कहा कि चुनाव से एक दिन पहले और मतदान वाले दिन किसी भी मीडिया प्लेटफॉर्म पर कोई राजनीतिक विज्ञापन नहीं दिया जा सकेगा। केरल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) के कार्यालय ने एक आधिकारिक अधिसूचना जारी कर स्पष्ट किया है कि 8 और 9 अप्रैल को किसी भी प्रिंट मीडिया या समाचार पत्र में राजनीतिक विज्ञापन प्रकाशित नहीं किए जा सकेंगे। यह निर्णय अंतिम क्षणों में मतदाताओं को लुभाने या गुमराह करने वाली कोशिशों को रोकने के लिए लिया गया है।
मीडिया सर्टिफिकेशन एंड मॉनिटरिंग कमेटी की भूमिका
आयोग ने विज्ञापनों की निगरानी के लिए एक त्रिस्तरीय व्यवस्था लागू की है। अधिसूचना के अनुसार, यदि कोई राजनीतिक दल विशेष परिस्थितियों में विज्ञापन प्रकाशित करवाना चाहता है, तो उसे जिला स्तरीय ‘मीडिया सर्टिफिकेशन एंड मॉनिटरिंग कमेटी’ (MCMC) से अनिवार्य रूप से अनापत्ति प्रमाण पत्र (Approval) लेना होगा। बिना कमेटी की मंजूरी के किसी भी प्रकार की राजनीतिक सामग्री का प्रकाशन आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन माना जाएगा। केरल में 9 अप्रैल को एक ही चरण में मतदान होना है, जहां सत्तारूढ़ एलडीएफ (LDF) और विपक्षी यूडीएफ (UDF) के बीच कांटे की टक्कर है। ऐसे में आयोग किसी भी प्रकार की विवादास्पद सामग्री को लेकर बेहद सतर्क है।
‘लेवल प्लेइंग फील्ड’ और निष्पक्ष चुनाव की चुनौती
निर्वाचन आयोग ने विज्ञापनों पर प्रतिबंध लगाने के पीछे एक ठोस तर्क दिया है। आयोग का कहना है कि चुनावी प्रक्रिया के अंतिम चरण में प्रिंट मीडिया में छपने वाले आपत्तिजनक या भ्रामक विज्ञापन शांतिपूर्ण और निष्पक्ष मतदान की भावना को ठेस पहुंचा सकते हैं। इसके अलावा, आयोग ने ‘लेवल प्लेइंग फील्ड’ यानी सभी दलों को समान अवसर देने की बात पर भी जोर दिया है। अक्सर देखा जाता है कि अमीर राजनीतिक दल भारी निवेश कर मीडिया पर छा जाते हैं, जिससे कम संसाधनों वाली पार्टियां पिछड़ जाती हैं। इस आर्थिक असमानता को दूर करने के लिए अंतिम दो दिनों में विज्ञापनों के प्रकाशन पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया है।
विज्ञापनों पर रोक: कोई नई बात नहीं, बंगाल में भी रहेगी नजर
हालांकि, चुनावी विज्ञापनों पर इस तरह की पाबंदी लगाना कोई पहली घटना नहीं है; पूर्व के चुनावों में भी आयोग ऐसे कदम उठा चुका है। आयोग का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मतदाता बिना किसी बाहरी दबाव या भ्रामक सूचना के अपने मताधिकार का प्रयोग कर सके। केरल के बाद पश्चिम बंगाल में भी इसी तरह की सख्ती देखने को मिल सकती है, जहां 23 और 29 अप्रैल को दो चरणों में मतदान होना है। बंगाल जैसे संवेदनशील राज्य में भी अंतिम समय के विज्ञापनों पर आयोग की कड़ी नजर रहेगी, ताकि चुनावी प्रक्रिया की गरिमा और सुरक्षा बनी रहे।
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