Kerala Election 2026: केरल में कांग्रेस का बड़ा दांव, सांसदों को ‘नो एंट्री’, क्या गुटबाजी खत्म कर पाएगी पार्टी?

केरल विधानसभा चुनाव 2026 के लिए कांग्रेस ने अपनी रणनीति बदल दी है। पार्टी ने स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी मौजूदा सांसद को विधानसभा का टिकट नहीं दिया जाएगा। के. सुधाकरन जैसे कद्दावर नेताओं की नाराजगी के बावजूद हाईकमान अपने फैसले पर अडिग है। क्या यह फैसला पार्टी की गुटबाजी को खत्म करेगा?

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

मार्च 21, 2026

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Kerala Election 2026:  दक्षिण भारतीय राज्य केरल में विधानसभा चुनाव की सरगर्मियां अब अपने उफान पर हैं। राजनीतिक दलों द्वारा उम्मीदवारों के चयन और नामों के ऐलान का सिलसिला बेहद तेज हो गया है। इसी कड़ी में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने शनिवार को अपने 11 प्रत्याशियों की तीसरी सूची जारी कर दी है, जिससे राज्य में त्रिकोणीय मुकाबले की तस्वीर और साफ हो गई है। दूसरी ओर, राज्य की प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने भी अपनी रणनीति को अंतिम रूप देते हुए सभी सीटों पर उम्मीदवारों के नाम तय कर लिए हैं। सत्ता में वापसी की पुरजोर कोशिश कर रही कांग्रेस के लिए यह चुनाव साख का सवाल बना हुआ है।

कांग्रेस का सीटों का गणित और उम्मीदवारों का चयन

केरल की कुल 140 विधानसभा सीटों में से कांग्रेस इस बार 92 सीटों पर प्रत्यक्ष रूप से चुनाव लड़ रही है। पार्टी ने बेहद सधे हुए अंदाज में अपने पत्तों को खोला है। पिछले दिनों 17 मार्च को जारी की गई पहली सूची में 55 उम्मीदवारों के नाम सामने आए थे, जबकि दूसरी और अंतिम सूची में शेष 37 प्रत्याशियों के नामों पर मुहर लगाई गई। कांग्रेस इस बार यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) गठबंधन के नेतृत्वकर्ता के तौर पर मैदान में है। शेष सीटें गठबंधन के अन्य सहयोगी दलों के खाते में गई हैं। पार्टी का मुख्य लक्ष्य वामपंथी सरकार को सत्ता से बेदखल कर फिर से राज्य की कमान संभालना है।

अंदरूनी कलह पर लगाम और बागियों को समर्थन

टिकट वितरण के दौरान अक्सर कांग्रेस में गुटबाजी और कलह देखने को मिलती है, लेकिन केरल में इस बार नेतृत्व ने काफी हद तक असंतोष को थामने में सफलता हासिल की है। 92 सीटों पर खुद चुनाव लड़ने के साथ-साथ कांग्रेस 3 ऐसी सीटों पर बागी नेताओं का समर्थन कर रही है, जिन्होंने सत्तारूढ़ सीपीएम (CPM) से अलग होकर अपना नया गुट बनाया है। यह रणनीति सीपीएम के वोट बैंक में सेंध लगाने और स्थानीय प्रभाव वाले नेताओं को अपने पाले में लाने के उद्देश्य से बनाई गई है। पार्टी आलाकमान ने इस बार क्षेत्रीय समीकरणों और गुटीय संतुलन को प्राथमिकता दी है।

सांसदों को मैदान में न उतारने का बड़ा फैसला

टिकटों के बंटवारे के दौरान कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती उन 6 सांसदों को संभालना था, जो विधानसभा चुनाव लड़ने की इच्छा जता रहे थे। पार्टी नेतृत्व के सामने एक बड़ी दुविधा यह थी कि यदि इन कद्दावर सांसदों को चुनावी मैदान में उतारा जाता, तो भविष्य में मुख्यमंत्री पद के दावेदारों की एक लंबी कतार खड़ी हो जाती। इस संभावित ‘पावर स्ट्रगल’ और अंदरूनी सिरफुटौवल से बचने के लिए आलाकमान ने कड़ा फैसला लेते हुए किसी भी मौजूदा सांसद को टिकट नहीं देने का निर्णय लिया। इस निर्णय से पार्टी ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि उसका ध्यान व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के बजाय सामूहिक जीत पर है।

अडूर प्रकाश का बयान और पार्टी अनुशासन का सम्मान

सांसदों को चुनाव न लड़ाने के फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए UDF संयोजक और सांसद अडूर प्रकाश ने पार्टी के अनुशासन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। उन्होंने बताया कि कोन्नी विधानसभा क्षेत्र की जनता और उनके समर्थक चाहते थे कि वे चुनाव लड़ें, लेकिन पार्टी के सामूहिक निर्णय के आगे वे नतमस्तक हैं। अडूर प्रकाश ने कहा, “मैंने 23 वर्षों तक विधायक के रूप में कोन्नी का प्रतिनिधित्व किया है, लेकिन संगठन के आदेश पर लोकसभा चुनाव लड़ा और जीता।” उन्होंने स्पष्ट किया कि वे चुनाव लड़ने के इच्छुक जरूर थे, लेकिन केंद्रीय नेतृत्व द्वारा सांसदों के लिए बनाए गए नियमों का वे पूर्णतः सम्मान करते हैं।

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