Jammu Kashmir Politics: जम्मू-कश्मीर की राजनीति में हलचल, उमर अब्दुल्ला ने लगाए गंभीर आरोप

जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने यह सनसनीखेज आरोप लगाकर राज्य की सियासत में भूचाल ला दिया है कि नेशनल कॉन्फ्रेंस के एक विधायक को पाला बदलने (दलबदल) के लिए 20 से 30 करोड़ रुपये और नई सरकार में मंत्री पद का लालच दिया गया था।

Jammu Kashmir Politics

Wrriten By :

Nivedita Kasaudhan

Published On :

जुलाई 11, 2026

Jammu Kashmir Politics: जम्मू-कश्मीर की राजनीति में शनिवार को उस समय भारी सियासी भूचाल आ गया, जब मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने सत्ताधारी नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC) के विधायकों को मोटी रकम देकर तोड़ने की कोशिश का सनसनीखेज आरोप लगाया। हजरतबल में बेगम अकबर जहां अब्दुल्ला (मादर-ए-मेहरबान) की 26वीं पुण्यतिथि के मौके पर पार्टी कार्यकर्ताओं के एक विशाल जनसमूह को संबोधित करते हुए उमर अब्दुल्ला ने दावा किया कि जम्मू क्षेत्र से नेशनल कॉन्फ्रेंस के एक विधायक को पाला बदलने के लिए 20 से 30 करोड़ रुपये की भारी-भरकम नकदी और नई सरकार में कैबिनेट मंत्री का पद देने का प्रलोभन दिया गया है। मुख्यमंत्री के इस बयान ने राज्य से लेकर देश की राजधानी तक राजनीतिक गलियारों में खलबली मचा दी है।

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विपक्षी दलों और विरोधियों पर सीधा और तीखा हमला बोलते हुए मुख्यमंत्री ने कहा, “कुछ ताकतें एक बार फिर नेशनल कॉन्फ्रेंस को भीतर से तोड़ने की नापाक साजिशें रच रही हैं। मुझे पुख्ता जानकारी मिली है कि हमारे जम्मू के एक विधायक को प्रलोभन दिया गया कि यदि वे पाला बदलते हैं, तो उन्हें 20-30 करोड़ रुपये, मंत्री पद और जम्मू-कश्मीर का राज्य का दर्जा बहाल कराने का सेहरा दिया जाएगा। वे सोचते हैं कि जनप्रतिनिधियों और जनता की अंतरात्मा इतनी सस्ती है जिसे पैसों के दम पर खरीदा जा सके।” हालांकि, मुख्यमंत्री ने रणनीति के तहत न तो उस विधायक के नाम का खुलासा किया और न ही उन चेहरों की पहचान उजागर की जो इस कथित हॉर्स-ट्रेडिंग की पेशकश के पीछे सक्रिय हैं।

आर-पार की लड़ाई का ऐलान

मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने केंद्र सरकार की नीतियों पर असंतोष जाहिर करते हुए अपनी भविष्य की राजनीतिक रणनीति साफ कर दी। उन्होंने कहा कि नेशनल कॉन्फ्रेंस ने हमेशा टकराव के बजाय लोकतांत्रिक संवाद के जरिए जम्मू-कश्मीर का पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल कराने का पक्ष लिया है और इसके लिए केंद्र को लगभग दो साल का लंबा समय भी दिया। उमर ने कहा, “मैंने बहुत सोच-समझकर और जिम्मेदारी के साथ केंद्र सरकार को अपने चुनावी वादे पूरे करने का पर्याप्त वक्त दिया। लेकिन अब हम सड़क पर उतरकर विरोध करने के लिए मजबूर हैं, क्योंकि केंद्र की नीयत में खोट साफ नजर आ रहा है।” इसी कड़ी में उन्होंने बड़ा ऐलान किया कि नेशनल कॉन्फ्रेंस आगामी 20 जुलाई को नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक विशाल और ऐतिहासिक विरोध प्रदर्शन करेगी, ताकि देश की संसद और सरकार के सामने राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग को पुरजोर तरीके से उठाया जा सके।

केंद्र और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को खुले मंच से ललकारते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि पिछले दरवाजे से सत्ता हथियाने की कोशिशें अब बर्दाश्त नहीं की जाएंगी। उन्होंने चुनौती दी, “अगर केंद्र का यही अड़ियल रुख है, तो उनमें सार्वजनिक रूप से यह सच स्वीकार करने की हिम्मत होनी चाहिए कि जब तक जम्मू-कश्मीर में बीजेपी की सरकार नहीं बन जाती, तब तक यहां के लोगों को उनका राज्य का दर्जा वापस नहीं मिलेगा।”

उमर ने दागे तीखे सवाल

उमर अब्दुल्ला ने अपने संबोधन में देश की सर्वोच्च अदालत के निर्देशों और केंद्र के पुराने वादों की याद दिलाई। उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 370 की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक स्पष्ट रोडमैप पेश किया था, जिसके तीन चरण थे—परिसीमन, विधानसभा चुनाव और फिर राज्य का दर्जा बहाल करना। उमर ने सवाल उठाया, “परिसीमन का काम पूरा हो चुका है, लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव संपन्न हो चुके हैं और जम्मू-कश्मीर की जनता ने हमें सरकार चलाने का स्पष्ट जनादेश दिया है। ऐसे में हमारा क्या कसूर है? राज्य का दर्जा बहाल करने का वादा अभी तक क्यों लटका कर रखा गया है?”

चुनी हुई लोकतांत्रिक सरकार के अधिकारों में कटौती और उपराज्यपाल (LG) शासन के हस्तक्षेप पर कड़ा ऐतराज जताते हुए मुख्यमंत्री ने राजभवन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए। उन्होंने बेहद तल्ख लहजे में पूछा कि यदि सूबे के सभी महत्वपूर्ण और नीतिगत फैसले राजभवन से ही तय होने हैं, यदि कर्मचारियों को मनमाने ढंग से नौकरी से निकालने जैसे काम वहीं से होने हैं, तो फिर करोड़ों रुपये फूंककर चुनाव कराने का क्या औचित्य था? हमारे हाथ पीछे बांधकर हमें सत्ता की कुर्सी पर क्यों बैठाया गया है?

शेर-ए-कश्मीर शेख मोहम्मद अब्दुल्ला के संघर्षों और 1984 में पार्टी के विभाजन के दौर का जिक्र करते हुए उमर अब्दुल्ला ने कार्यकर्ताओं में जोश भरा। उन्होंने भावुक होते हुए कहा, “हमने इतिहास में बहुत उतार-चढ़ाव देखे हैं, लेकिन कभी संयम का रास्ता नहीं छोड़ा। शेख साहब ने हमें सिखाया था कि हमारा सब्र हमारी कमजोरी नहीं, बल्कि हमारी सबसे बड़ी ताकत है। इसका यह मतलब कतई नहीं है कि हम अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए आवाज उठाना छोड़ देंगे। हमारी मांग बिल्कुल स्पष्ट और संवैधानिक है—जम्मू-कश्मीर को उसका पूर्ण राज्य का दर्जा तुरंत वापस किया जाए।”

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