Jagannath Rath Yatra 2026: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने पुरी की ऐतिहासिक रथयात्रा के पावन अवसर पर महाप्रभु श्रीजगन्नाथ के साथ अपने गहरे आध्यात्मिक संबंधों और जीवन के अनुभवों को साझा किया है। राष्ट्रपति के अनुसार, महाप्रभु जगन्नाथ उनके लिए केवल आराध्य देव नहीं, बल्कि समता, करुणा और सेवा के जीवंत प्रतीक हैं। उनकी सदैव जागृत और विशाल आंखें पूरी मानवता पर बिना किसी भेदभाव के समान रूप से अपनी कृपा बरसाती हैं।
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भजनों से जागी अटूट आस्था
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए बताया कि महाप्रभु जगन्नाथ से उनका आध्यात्मिक लगाव बेहद कम उम्र में ही शुरू हो गया था।
पारिवारिक और स्कूली वातावरण: गांव के धार्मिक माहौल, घर में होने वाली आध्यात्मिक चर्चाओं और स्कूल की प्रार्थनाओं ने उनके मन में जगन्नाथ संस्कृति के प्रति गहरी आस्था के बीज बोए। बचपन में वे स्कूल में भक्त सालबेग की प्रसिद्ध प्रार्थना ‘आहे नीड़ो शोइड़ो’ गाया करती थीं।
शिक्षकों की सीख: शिक्षकों से उन्होंने सुना था कि पुरी का मंदिर ‘बड़ा मंदिर’ है, जहाँ भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ विराजमान हैं। जगन्नाथजी का श्याम वर्ण और उनकी गोल-गोल बड़ी आंखें, सुभद्राजी का पीला रंग और बलभद्रजी का श्वेत रूप—यह एक ऐसी दिव्य छवि है जो एक बार मन में बस जाए तो कभी ओझल नहीं होती।
रथयात्रा की दिव्यता और जीवन का संबल
भुवनेश्वर में अपनी पढ़ाई के दौरान द्रौपदी मुर्मू ने पहली बार पुरी जाकर चतुर्धा विग्रह के प्रत्यक्ष दर्शन किए थे, जिसका उनके मन पर अमिट प्रभाव पड़ा।
महापर्व रथयात्रा की अनूठी छटा
पुरी (श्रीक्षेत्र) में वैसे तो साल के बारह महीनों में तेरह त्योहार मनाए जाते हैं, लेकिन रथयात्रा का वैभव सबसे निराला है। साल में एक बार महाप्रभु अपने भव्य गर्भगृह से बाहर निकलकर ‘बोड़ो दांडो’ (विशाल पथ) पर आते हैं ताकि हर वर्ग के भक्तों को दर्शन दे सकें। तीन भव्य रथों पर सवार होकर भगवान बलभद्र, देवी सुभद्रा और महाप्रभु जगन्नाथ, चक्रराज सुदर्शन के साथ गुंडिचा मंदिर की ओर प्रस्थान करते हैं।
हर परिस्थिति में महाप्रभु का साथ
राष्ट्रपति ने भावुक होते हुए कहा कि उनके जीवन के हर उतार-चढ़ाव और कठिन परिस्थितियों में महाप्रभु ही उनके सबसे बड़े संबल (सहारा) रहे हैं। जब उन्हें देश के सर्वोच्च राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार घोषित किया गया था, तब भी उन्होंने सबसे पहले महाप्रभु का ही स्मरण किया था। शपथ ग्रहण से लेकर देश के नाम अपने पहले संबोधन तक, उन्होंने हर पल भगवान की दिव्य उपस्थिति और आशीर्वाद को महसूस किया।
प्रोटोकॉल तोड़कर नंगे पैर सिंहद्वार तक की यात्रा
राष्ट्रपति बनने के बाद जब वे काफी समय तक पुरी नहीं जा पाईं, तो उनका मन महाप्रभु के दर्शन के लिए व्याकुल रहने लगा। अंततः 10 नवंबर 2022 को उन्हें पुरी जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
श्रीमंदिर से करीब दो किलोमीटर पहले ‘बड़दांड’ पहुंचते ही उन्होंने राष्ट्रपति पद के कड़े वीवीआईपी प्रोटोकॉल को किनारे रख दिया और नंगे पैर ही मंदिर की ओर पैदल चल पड़ीं। मंदिर के शीर्ष पर स्थित नीलचक्र और पतित पावन-ध्वज को निहारते हुए वे भावविभोर होकर आगे बढ़ती रहीं। सिंहद्वार पर पहुंचते ही उन्होंने वहां की पावन धूल में साष्टांग प्रणाम किया और गर्भगृह में जाकर महाप्रभु के दर्शन कर अपना जीवन धन्य किया। महाप्रभु की यही प्रेरणा उन्हें समाज के हर वर्ग, विशेषकर वंचितों की सेवा करने की शक्ति देती है।
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