Israel Lebanon Ceasefire : इजरायल और लेबनान के बीच हफ्तों से जारी भीषण सैन्य संघर्ष के बाद अब शांति की पहली किरण दिखाई दे रही है। लंबे समय से चल रही बमबारी और जमीनी हमलों के बीच, एक संभावित युद्धविराम समझौते (Ceasefire Agreement) ने वैश्विक समुदाय का ध्यान अपनी ओर खींचा है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति के गलियारों में इस बात की चर्चा तेज है कि क्या यह समझौता टिकाऊ होगा या केवल एक संक्षिप्त विराम। कतर की मीडिया रिपोर्ट्स ने इस समझौते के पीछे की कूटनीति पर बड़े खुलासे किए हैं, वहीं दूसरी ओर अमेरिका और ईरान के बीच इस शांति का श्रेय लेने की होड़ मच गई है।
ईरान और पाकिस्तान का बढ़ता प्रभाव: शांति समझौते के पीछे के नए समीकरण
कतर के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों के अनुसार, इस शांति समझौते की नींव रखने में ईरान और पाकिस्तान ने पर्दे के पीछे अहम भूमिका निभाई है। हाल ही में पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर की तेहरान यात्रा को इस संभावित युद्धविराम से जोड़कर देखा जा रहा है। ईरान का दावा है कि उसने इजरायल पर प्रभावी कूटनीतिक और सामरिक दबाव बनाया है। ईरान के सूत्रों के मुताबिक, यह सीजफायर शुरुआती तौर पर एक सप्ताह के परीक्षण आधार पर लागू किया जा सकता है, जिसके सफल रहने पर इसे आगे बढ़ाया जाएगा। हालांकि, इजरायली कैबिनेट की अंतिम मुहर का अभी इंतजार है।
हिजबुल्लाह का दावा: होर्मुज स्ट्रेट की नाकेबंदी से झुका इजरायल?
लेबनान के शक्तिशाली सशस्त्र समूह हिजबुल्लाह ने इस संभावित शांति प्रक्रिया का पूरा श्रेय अपने संरक्षक देश ईरान को दिया है। हिजबुल्लाह के आधिकारिक बयानों में कहा गया है कि ईरान द्वारा होर्मुज स्ट्रेट को बंद करने की चेतावनी और रणनीतिक दबाव के कारण इजरायल रक्षात्मक मुद्रा में आया है। उनके अनुसार, आर्थिक और समुद्री मार्ग पर पैदा हुए संकट ने इजरायली सरकार को सीजफायर की मेज पर आने के लिए मजबूर कर दिया। हिजबुल्लाह इसे अपनी प्रतिरोधक क्षमता की जीत के रूप में देख रहा है।
अमेरिकी कूटनीति और मार्को रूबियो का हस्तक्षेप: श्रेय लेने की होड़
दूसरी तरफ, वाशिंगटन इस शांति प्रक्रिया को अपनी बड़ी राजनयिक उपलब्धि बता रहा है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने इजरायल और लेबनान के प्रतिनिधियों के साथ सीधी उच्च स्तरीय वार्ता की है। विशेषज्ञों का मानना है कि साल 1993 के बाद यह दोनों देशों के बीच हुई सबसे गंभीर और महत्वपूर्ण बातचीत है। अमेरिका का तर्क है कि उसकी निरंतर मध्यस्थता और रूबियो की प्रभावी रणनीति के कारण ही दोनों पक्ष हथियार डालने को तैयार हुए हैं। अमेरिका इस मौके का इस्तेमाल मध्य पूर्व में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए कर रहा है।
हिजबुल्लाह के प्रभाव को खत्म करने का लक्ष्य: रूबियो का कड़ा रुख
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने स्पष्ट किया है कि उनका मुख्य उद्देश्य केवल युद्ध रोकना नहीं, बल्कि क्षेत्र में पिछले तीन दशकों से कायम हिजबुल्लाह के वर्चस्व को जड़ से उखाड़ना है। रूबियो का मानना है कि लेबनान की आम जनता ईरान की विस्तारवादी नीतियों और हिजबुल्लाह की उग्रवादी गतिविधियों की शिकार बनी है। अमेरिका इस समझौते के जरिए लेबनान की संप्रभुता को मजबूत करना चाहता है ताकि वहां की सेना देश पर पूर्ण नियंत्रण पा सके और विदेशी समर्थित गुटों का हस्तक्षेप समाप्त हो।
लेबनान के आंतरिक मतभेद: सुन्नी और ईसाई समुदायों का विरोध
इस अंतरराष्ट्रीय विवाद के बीच लेबनान की घरेलू राजनीति भी उबल रही है। लेबनान सरकार ने स्पष्ट किया है कि वह अपनी संप्रभुता की रक्षा करने और स्वतंत्र रूप से बातचीत करने में सक्षम है। दिलचस्प बात यह है कि लेबनान के भीतर सुन्नी और ईसाई समुदाय के लोग हिजबुल्लाह की नीतियों का खुलकर विरोध कर रहे हैं। उनका मानना है कि हिजबुल्लाह के कारण ही पूरा देश युद्ध की आग में झुलस रहा है। देश का एक बड़ा वर्ग अब ईरान के प्रभाव से मुक्त होकर एक स्थिर और शांतिपूर्ण लेबनान की मांग कर रहा है।
मानवीय त्रासदी: विस्थापन और पुनर्वास की बड़ी चुनौती
युद्ध का सबसे भयावह चेहरा दक्षिणी लेबनान में देखने को मिल रहा है, जहां इजरायल के सबसे घातक सैन्य हमले हुए हैं। इन हमलों के कारण हजारों परिवारों को अपने पुरखों के घर छोड़कर पलायन करना पड़ा है। बेरूत और अन्य सुरक्षित इलाकों में आज भी लाखों लोग शरणार्थी शिविरों में अत्यंत दयनीय स्थिति में रह रहे हैं। युद्धविराम समझौता केवल राजनीतिक जीत-हार का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह उन मासूम नागरिकों के लिए जीवनदान की तरह है जो पिछले कई महीनों से बारूद के साये में जी रहे हैं। अब देखना यह है कि क्या यह समझौता धरातल पर शांति ला पाएगा।









